कचोरी का टुकड़ा...



      दूर से नज़र आ रही धुंधली  तस्वीर का धीरे—धीरे पास आना और जानी हुई सूरत के साथ मुस्कुरा देना...। और वो हाथों में कागज़ की एक छोटी सी 'पुड़की'  पकड़ाकर कहना कि, जा दौड़, मैं पीछे आया...।  

   मीठी यादोें के साथ जब गीता की नींद खुली तब उसके सामने वो तस्वीर नहीं थी जो उसने सपने में देखी थी। भला हो भी कैसे सकती थी...। येे तो बरसों पहले ही पीछे छूट गई है।  

       लेकिन गीता सपने की उस  धुंधली तस्वीर को खुली आंखों से महसूस करती है। ये तस्वीर उसके नाना की है जो साइकिल से चले आ रहे हैं और पास आकर उसके हाथों में वो कागज़ की 'पुड़की' देकर कहते हैं कि जा दौड़, मैं पीछे आया....। 
    गीता दौड़ लगाती हैं कुएं की मुंडेर तक...जहां गुलाबी ओढ़नी ओढ़े  हुए बैठी हैं उसकी नानी। गीता की फूली हुई सांस देखकर नानी कहती है, भला यूं सरपट दौड़कर आ रही हैं कहीं रपट जाती तो...। 

   गीता अपनी नानी के हाथ में वो कागज़ की 'पुड़की'  थमाती है और पास ही बैठ जाती है। नानी उसके सिर पर हाथ फेरती हैं और फिर दोनों खेतों की पगडंडी की ओर नज़रें गढ़ा कर देखने लगती है। 
  
   साइ​किल के साथ नाना चले आ रहे हैं और हैंडल पर कपड़े की थैली लटकी हुई हैं जिसमें गीता के लिए कुछ खाने की चीज़े हैं। बाकी नानी की रसोई के लिए कुछ ज़रुरी सामान है। 
    
   साइकिल को मेढ़  के किनारे से  टिकाकर नाना भी अब गीता  के पास आकर बैठ गए। हंसते हुए बोले, अरे.. 'पुड़की'  नहीं खोली अभी तक..। नानी धीमें से मुस्कुराती है..और वो कागज़ की 'पुड़की' खोलती है। इसमें कचोरी का आधा टुकड़ा हैं। जो सिर्फ दो कोर भर है। 
   
  गीता उस टुकड़े को एकटक देखती हैं...इसलिए नहीं कि उसे खाना हैं बल्कि इसलिए कि रोज़ाना ही इस  'पुड़की'  में कचोरी का आधा टुकड़ा ही होता है। वह रोज इस उम्मीद से  'पुड़की' को देखती है कि शायद आज पूरी कचोरी होगी। गीता को लगता हैं कि नाना रोज़ाना कचोरी लाते हैं लेकिन नानी के लिए ये सिर्फ आधा टुकड़ा ही क्यूं होता है। ये सवाल हर रोज़ वो ख़ुद से करती है। 
     वैसे गीता को कचोरी बिल्कुल पसंद नहीं थी उसे तो नमकीन चाहिए थी जो कपड़े की थैली में नाना लेकर आए थे। वह थैली में से नमकीन निकालती हैं और उसे कागज़ पर डालती हैं फिर तीनों मिलकर उसे खाते हैं। बीच—बीच में नाना—नानी की बातें और हंसी ठठ्ठा चलता रहता। गीता अपने से जुड़ी कोई बात सुनती तो वह भी बीच—बीच में अपनी बात रख देती। ये सिलसिला रोज़ाना यूं ही चलता रहा। 

       एक दिन गीता ने अपनी नानी से पूछ ही लिया। नानी..क्या तुम्हें पूरी कचोरी खाना पसंद नहीं है। नानी जोर से हंस पड़ी...फिर तो इस सवाल ने नानी को खूब हंसने पर मजबूर कर दिया...। गीता कहती जाती नानी अब हंसना बंद भी करो...। बताओ ना पूरी कचोरी क्यूं नहीं खाती हो...। 


   हंसते—हंसते नानी की आंखोें से आंसू निकलने लगे। वो अपने आंसू अपनी लुगड़ी के पल्लू से पोंछती हैं और तभी बेसब्र गीता फिर कह उठती है, अरे बताओ ना..।  
   
    नानी कहती है कि कचोरी का आधा टुकड़ा नाना बाज़ार में ही खा लेते हैं और बाकी आधा टुकड़ा मेरे लिए बचाकर ले आते हैं..।  गीता ​धीमें से हंसती हैं। भला ये क्या बात हुई। वो पूरी कचोरी बाज़ार में ही क्यूं नहीं खा लेते। और फिर दूसरी कचोरी आपके लिए ले आए। ऐसे आधा टुकड़ा बचाकर लाने की क्या ज़रुरत है। नानी कहती हैं ये तु तेरे नाना से ही पूछना। 
   
   गीता आज पक्का मन बना चुकी थी कि नाना आएंगे और वो उनसे कचोरी के टुकड़े के बारे में ज़रुर पूछेगी। वो बेसब्र आंखों से खेतों की पगडंडी की ओर नज़रें गढ़ा कर देखने लगती है। कुछ देर बाद उसे नाना दिखाई देते है। वो ही साइकिल के साथ और ​हैंडल पर कपड़े की थैली लटकाए हुए नाना चले आ रहे है। 

    नाना मेढ़ से साइकिल को टिकाते हैं तभी गीता  उनकी ओर दौड़ पड़ती हैं। और उनसे वो कागज़ की 'पुड़की'  ले लेती है। नाना फिर वही कहते हैं जा दौड़...मैं पीछे आया। 

     लेकिन आज गीता नानी की ओर नहींं दौड़ती है। वो नाना के साथ ही चलती है। नाना उसके सिर पर हाथ फेरते है। और हैंडल से कपड़े की थैली निकालते हुए पूछते हैं। क्या हुआ तु आज  'पुड़की'  लेकर दौड़ी क्यूं नहीं। 
         गीता कहती है नाना आप मेरेे एक सवाल का जवाब दो पहले। नाना मुस्कुरातेे हैं और कहते हैं बता क्या सवाल है तेरा। गीता चलते—चलते रुक जाती हैं...और पूछती है। आप रोज़ाना आधी कचोरी का टुकड़ा ही क्यूं लाते हो। नाना ये सुनकर जोर से हंस पड़ते हैं। 
   
    वे उसके कंधे पर हाथ रखते है और नानी की ओर चलते हुए कहते हैं, वो देख नानी को...उसकी नज़रें पगडंडी की ओर ही हैं। वो हमें देख रही हैं...। गीता  कहती है..हां..वो तो रोज़ ऐसे ही देखती हैं। 

       नाना आगे कुछ और कह पाते तब तक वे दोनों नानी के पास पहुंच जाते हैं। गीता कहती है..आप कुछ कह रहे थे...नानी रोज़ पगडंडी की ओर देखती हैं फिर क्या...। नाना और नानी दोनों हंस पड़ते हैं। 
   
गीता नाना—नानी की तरफ रुठते हुए देखती हैं और कहती हैं आप दोनों ने ही मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया। मैं आप दोनों से नाराज़ हूं। नाना तभी कह उठते हैं अरे नहीं...। सच तो ये है कि मुझे कचोरी बहुत पसंद हैं और मैं आधी कचोरी ही खा पाता हूं। मेरे दांत कमज़ोर है ना। अब आधी कचोरी फेंक भी तो नहीं सकता। इसीलिए वो टुकड़ा बचाकर ले आता हूं। और तुम्हारी नानी को दे देता हूं। समझी...। 

      गीता हंस देती है। और नाना—नानी के गले से लग जाती है। आज वो बहुत खुश होती है क्योकि कचोरी के टुकड़े का जवाब उसे मिल गया है। 

    फिर तीनों साथ बैठकर नमकीन खाते है। नाना—नानी का हंसी ठट्ठा भी यूं ही चलता रहा। गीता भी उनके साथ बेहद खुश थी। साल बीतते रहे...। 
   एक दिन नाना की तबीयत बिगड़ गई। उन्हें अस्पताल ले जाया गया। कुछ दिन वे अस्पताल में रहे फिर घर आ गए। 

    लेकिन एक—दो दिन आराम करने के बाद वे फिर अपनी साइकिल पर सवार होकर बाज़ार की ओर निकल पड़े। नानी ने उन्हें ख़ूब रोका लेकिन वे नहीं माने। नानी के चेहरे पर उनकी तबीयत को लेकर चिंता साफ दिख रही थी।  

       कुछ देर में नाना बाज़ार से लौट आए। फिर उसी कागज़ की  'पुड़की' और नानी की रसोई के सामानों के साथ। लेकिन आज वे बहुत थके हुए से लग रहे थे। रोज़ाना की तरह उनका शरीर फूर्तिवाला  नज़र नहीं आ रहा था। उम्र भी हो चुकी थी...लेकिन बाज़ार जाए बिना भला वे कैसे मानते। 

      अगले दिन उनका शरीर जवाब दे चुका था। वे बिस्तर से नहीं उठ सके। उन्हें फिर अस्पताल भर्ती किया गया। और कुछ दिन इलाज के बाद फिर उन्हें घर लाया गया। लेकिन इस बार नाना बेड रेस्ट ही थे। वे अपनी साइकिल को देखते रहते लेकिन उठकर बाज़ार जाने की हिम्मत नहीं जुटा सके। नानी उन्हें बार—बार दिलासा देती कि वे आराम करेंगे तो जल्दी ठीक हो जाएंगे। लेकिन नानी भी अंदर से टूट रही थी। नाना को ऐसे बीमार देखकर उसकी आंखों में भी ख़ामोशी थी। जिसे नाना भी महसूस कर रहे थे। 

      नानी दिनरात उनकी सेवा करती। वह उनकी नज़रों के सामने ही रहकर सारा काम करती। और जब काम ख़त्म हो जाता तो नाना के सिरहाने आकर बैठ जाती। नानी का हाथ उनके सिर पर होता। 
    
     धीरे—धीरे नाना की तबीयत और बिगड़ती चली गई। डॉक्टरों ने भी अब जवाब दे दिया था। नानी दिनरात प्रार्थना करती। उनके सिरहाने बैठकर उन्हें देखती रहती। उसकी आंखों से आंसू टपकते रहते। दोनों बेबस थे। 

     नाना अब कुछ दिनों, घंटों या मिनटों की ही सांसे ले रहे थे। और फिर बस वो क्षण आ गया जो नानी को बेहद दर्द देने वाला था। नाना ने नानी के सामने ही अंतिम सांस ली। नानी फूट—फूटकर  रोई...और उन पलों को याद करती रही जो नाना के साथ हंसी—ठट्ठा करते हुए जीए थे। 
    

    नानी अकेली रह गई। और वो कचोरी का टुकड़ा भी...। 

गीता की आंखों में भी आंसू है। अब वो सयानी हो गई है। लेकिन आज उसे कागज़ की वो 'पुड़की'  और उसमें आए 'कचोरी के टुकड़े' की वास्तविकता का जवाब मिल गया था। नाना ने उस दिन उसे जो जवाब दिया था वो सच नहीं था।


     असल में सच तो यह था कि नाना और नानी दोनों एक दूसरे से बेइंतहा मोहब्बत करते थे। उम्र के इस पड़ाव में  भी उनका एक दूसरे के प्रति आत्मिक लगाव, प्यार और समर्पण बहुत गहरा था।  नाना जब बाज़ार से कचोरी लेते थे तो नानी के बगैर अकेले खाने का उनका जी नहीं करता था। उनको लगता था कि जिंदगी के हर हिस्से में उसका हक हैं, फिर कचोरी पर क्यों नहीं। 
     

       गीता ने महसूस किया कि अंतिम दिनों में जिस तरह से नाना—नानी का एक दूसरे के प्रति जो प्यार और तड़प थी, वाकई वो सिर्फ एक कचोरी का टुकड़ा ही नहीं था बल्कि वो बेशुमार प्यार था जोे एक कागज़ की  'पुड़की'  में बंधकर आता था...। जो नानी के लिए नाना लेकर आया करते थे। 


-------------

        दरअसल,  कहानी में इस्तेमाल  'पुड़की'  शब्द का अर्थ कागज़ की पुड़ियां से हैं।   



 कुछ और कहानियां - 


Leave a comment



Vaidehi-वैदेही

2 years ago

सच्चा प्रेम जो अब विरले ही देखने को मिलता है, दिल छू लेने वाली कहानी

Teena Sharma madhavi

2 years ago

''Pudki'' is new word. Nice story

Teena Sharma 'Madhvi'

2 years ago

प्यार में आत्मिक लगाव ज़रुरी हैं।

Teena Sharma 'Madhvi'

2 years ago

Ji.... Thank-you

'मां' की भावनाओं का 'टोटल इन्वेस्टमेंट' - Kahani ka kona

5 months ago

[…] लिंक पर क्लिक करें— चिट्ठी का प्यार... कचोरी का टुकड़ा... "बातशाला" 'अपने—अपने अरण्य' सात फेरे... […]

output-onlinepngtools-tranparent

Follow Us

Contact Info

Copyright 2022 KahaniKaKona © All Rights Reserved

error: Content is protected !!