लौटा बचपन मारा सितोलिया

जवाहर कला केंद्र

by teenasharma
लौटा बचपन मारा सितोलिया

लौटा बचपन मारा सितोलिया

लौटा बचपन मारा सितोलिया...। कुछेक ने अपनी रचनाएं भी पढ़ी किंतु अंदाज़े—ए—बयां में मस्ती की झलक साफ  नज़र आई।  वे गंभीर भावों से अछूते ही रहे। इसी सादगी ने कार्यक्रम में मौसम के संग उन्मुक्तता के रंग भी भर दिए। और शब्दों के जादूगरों का कुछ यूं निकल पड़ा बचपना..।  

लौटा बचपन मारा सितोलिया

एपीसी की ओर से आयोजन

”जीवन चलने का नाम, चलते रहो सुबह—ओ—शाम…। ”राजकवि इंद्रजीत सिंह तुलसी का लिखा हुआ ये गीत जवाहर कला केंद्र में उस वक़्त साकार हो उठा, जब एक साथ एक ही स्वर में  शब्दों के जादूगरों ने ये गीत गाया।

अवसर था जवाहर कला केंद्र में, अजमेर पोएट्री क्लब की ओर से आयोजित एक अनौपचारिक कार्यक्रम का। 

जहां पर इस गीत का ‘शौर’ मचा, किंतु अपने बचपन की यादों के भावों संग..। ”शौर’ मचा पर ना कोई कवि था, ना ही लेखक…गर इस वक़्त कोई था, तो  इनका बचपना। जिसे आज अपने बेफिक्रे अंदाज़ में वे जी लेना चाहते थे। 

बच्चे की ​मानिंद खेले और गाया

इस कार्यक्रम में  लेखक, कवि और साहित्यकारों की मौजूदगी रही लेकिन वे ख़ुद एक बच्चे के मानिंद हंसी—ठिठौली और बिंदासपने में खोए नज़र आए। कभी अंताक्षरी खेलकर तो कभी सितोलिया फेंककर…। 

एपीसी की शिवानी जयपुर ने बताया कि ‘साहित्यिक कार्यक्रम’ तो होते ही रहते हैं पर एपीसी की कोशिश रहती है कि साल की शुरुआत एक ऐसे कार्यक्रम से हो जहाँ हम सब साहित्यकार का चोला घर छोड़कर आएं और इंसान बनकर मिलें-जुलें। अपने भीतर के बच्चे को बाहर आने का सुअवसर दें। दिखावे और वैमनस्य की दुनिया में उस बचपने को बचाए रखना बहुत ज़रूरी है जिसे देखकर किसी शायर ने कहा था कि ‘मेरे भीतर एक बच्चा है जो बड़ों की दुनिया देखकर बाहर आने से डरता है…।

 

इस अवसर पर कविता माथुर, डॉ. बजरंग सोनी, अनुपम तिवाड़ी, एस भाग्यम शर्मा, अरविंद भट्ट, डॉ. क्षिप्रा नत्थानी, श्याम जी आहत, मीनाक्षी माथुर, श्रुतिछाया, उषा नांगिया, अनुपमा तिवाड़ी, प्रीति जैन, शत्रुंजय कुमार सिंह,

लौटा बचपन मारा सितोलिया


एपीसी की ओर से आयोजन

तारकेश्वरी ‘सुधि’ , सन्तोष “सन्त”,अनु शर्मा,भरत राजगुरु, विजय पॉटर, गुरगुल, सागर सैन, प्रज्ञा श्रीवास्तव ‘प्रज्ञान्जलि’ व अन्य लोग भी शामिल हुए।

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