एक शाम

kahani-वैदेही वैष्णव

by teenasharma
एक शाम

एक शाम…। मन के ज्वालामुखी पर समाज की रूढ़ियों का ढक्कन लगा हुआ था। दर्द ने फिर भी अपना रास्ता ढूंढ ही लिया था औऱ वह मन से रिसता हुआ आँखों के किनारों तक पहुंच गया औऱ कतरा – कतरा बहने लगा ।

एक शाम

दिसम्बर की कड़ाके की सर्दियों की एक शाम मेरे लिए रेगिस्तान के तपते हुए दिन के जैसी थीं । मन में दर्द का ग़ुबार ऐसा था जैसे कोई सुप्त ज्वालामुखी हो जिसके अंदर गर्म लावा कुलबुला रहा हो बाहर निकलने के लिए । मन के ज्वालामुखी पर समाज की रूढ़ियों का ढक्कन लगा हुआ था। दर्द ने फिर भी अपना रास्ता ढूंढ ही लिया था औऱ वह मन से रिसता हुआ आँखों के किनारों तक पहुंच गया औऱ कतरा – कतरा बहने लगा ।

कमरें में सन्नाटा पसरा हुआ था लेक़िन हर एक कोना चीख़ – चीख़कर हाल बयां कर रहा था मेरे जीवन का । कमरे में फर्श पर पड़े सामान के जैसी बिखरीं हुई थीं मेरी ज़िंदगी भी।

कितनी कोशिश की थी मैंने इसे संवारने की… समेटने की पर हर बार मैं नाकामयाब रहीं। 

याद आती है अतीत की सारी गलतियां जो मैंने अनजान बनकर की । याद आतें है मम्मी – पापा जब वह मुझें अपने पास बैठाकर बड़े ही प्रेम से समझाते थे – गुड्डन वो लड़का बिल्कुल भी सही नहीं है। हम तुम्हारे भले के लिए ही कह रहे है । उससे मिलना छोड़ दो ।

पर तब कहाँ समझ आती थी वो नसीहत वो लाड़-प्यार…? तब तो मुझ पर शांतनु के इश्क़ का भूत सवार था । मुझें उसके सिवा कुछ औऱ दिखाई ही नहीं देता था। जैसे भौंरा कमल के फूल पर मंडराता रहता है औऱ फ़िर शाम होंते ही उसी कमल की पंखुड़ियों में कैद हो जाता है ठीक वैसे ही मैं औऱ मेरी दुनिया सिमट कर रह गई थी औऱ मैं शांतनु के प्यार में कैद हो गई जो अब आजीवन कारावास की सज़ा लगता है।

याद आतें है कॉलेज के वो दिन जहाँ मैं पहली बार शांतनु से मिली थीं। किसी दिल फेंक आशिक़ की तरह मीठी सी मुस्कान लिए वह मेरी तरफ़ बढ़ रहा था। तब कहाँ पता था कि इस सुंदर से चेहरे के पीछे भी एक चेहरा छुपा हुआ है जो बहुत ही भयानक है।

जाने कैसे लोग नक़ाब ओढ़े जी लेते है …क्या कभी इन्हें अपने दोहरे व्यवहार से घुटन नहीं होती…? अरे मैं भी कैसी बावली हुँ ऐसे लोग को खुदसे घुटन नहीं होती बल्कि ये दूसरों के जीवन में ज़हर घोलकर दूसरों के अरमानों का , भावनाओं का गला घोंट देते है । शांतनु भी उन्हीं लोगो में से एक था , जिसकी कथनी करनी अलग थी।

शादी से पहले उसकी बातें मिश्री सी मीठी लगती थीं। वह अक्सर मेरी तारीफ़ों के पुल बांधा करता था जो झूठ की ईंटों से जोड़े गए थे जिसकी कोई नींव नहीं थीं। तभी तो बहुत जल्दी धराशायी हो गए थे सारे पुल।

एक शाम

वैदेही वैष्णव

जो लड़की कॉलेज में थी वही अब भी है , लेकिन अब मेरी हर बात उसे बेतुकी औऱ बचकानी लगती है। मेरे हर काम मे वह मीन मेख निकाला करता है। जबकी पहले मेरा हर काम परफेक्ट हुआ करता था।

नरम रोटी उसे रुमाल लगतीं औऱ ज़्यादा सेंक दो तो पापड़ । आज भी सब्जी में नमक सही था फिर भी नमक कम है कहकर खाने की प्लेट फेंककर वह भनभनता हुआ चला गया। मैं डायनिंग टेबल बैठी रहीं।

दरवाजा खुलने की आवाज से मैंने खुद को संभाला। कांता थी। मैं दरवाजे पर चिटकनी लगाना भूल ही गई थीं। जस की तस बैठी ही रह गई । यह पहली बार नहीं हुआ था। हर मौसम की कभी शाम , कभी दिन तो कभी रात सिसकियों में बीत जाया करतीं थीं।

कांता साड़ी को कमर में खोंसते हुए मुझसें बोली – ” हाय दैय्या ! प्लेट कैसे टूट गई भाभीजी ?

अपने दुःख को एक औपचारिक मुस्कान के नीचे दबाकर मैंने कहा – अरे ! प्लेट लगा ही रही थी कि हाथ से छूट गई।

कांता मेरी औऱ बढ़ते हुए बोली – ” मैं साफ किए देती हूँ आप खाना खा लो “

मैंने कहा – ” तुम बर्तन साफ़ कर लो इसे मैं देख लुंगी। मैंने हड़बड़ी मैं प्लेट के टुकड़े समेटना शुरू किया तो एक नुकीला सिरा मेरी कलाई को चीरता हुआ अंदर तक धंसता गया।

कांता तेज़ आवाज़ में चिल्लाते हुए मेरी तरफ़ दौड़ी – अरे ! अरे ! भाभीजी….देखों चोट लग गई न ..? उसने कसकर मेरी कलाई पकड़ ली। बहते खून को देखकर वह घबरा गई। पर मेरे चेहरे पर कोई हाव-भाव नहीं था। आँखे कांता को एकटक देखती रहीं।

मैंने कांता से कहा – “पगली छोटी सी खरोंच है , जाओ फर्स्टएड बॉक्स ले आओ।”

वह सरपट दौड़ी औऱ फर्स्टएड बॉक्स ले आई।उसने तुरंत पट्टी बांध दी। औऱ मेरे लिए पानी ले आई।

चेहरे पर गम्भीर भाव लिए वह अचकाचते हुए मुझसें बोली – ” भाभीजी , सब ठीक तो है न ..?
आप अब पहले की तरह नहीं दिखती । ऐसा लगता है जैसे बीमार हो।

मैं मन ही मन बुदबुदाई – ” काश ! बीमार ही होतीं । ” इस लाचारी से अच्छी तो बीमारी है । जिसका ईलाज न भी हो तो मृत्यु तो निश्चित ही है। यूँ घूट-घूटकर मरना तो नहीं पड़ता।

एक शाम

वैदेही वैष्णव

मुझें चुप देखकर वह फिर से बोली – ” आप कुछ दिन अपने मायके चले जाओ। जगह बदलेगी तो आपका मन ठीक हो जाएगा। “मैंने हाँ में सिर हिला दिया। बोलने के लिए शब्द मुँह से नहीं निकल पाएं। गला रुन्ध गया था।

कांता किचन में चली गईं। मैं सोफ़े पर बैठें हुए अतीत को कुरेदने लगीं। मायके कैसे चली जाऊं ..? बाबुल की गलियां , चौबारे , सखी , सहेलियां सबकों मैं शांतुन के लिए छोड़ आई थीं।  क्या अब भी मम्मी-पापा मेरी राह देखते होंगे ?
गुड्डन…गुड्डन की आवाज़ से क्या अब भी घर गूँजता होगा ?

नहीं …नहीं….जो मैंने किया उसके हिसाब तो अब मेरे लिए उस घर के दरवाजे सदा के लिए बंद हो गए होंगे। अब कोई नहीं पुकारता होगा मेरा नाम लेकर। आज भी वह दिन किसी कड़वी याद की तरह मन को कचोटता है…..

वो गुरुवार की सुबह थीं। मम्मी साईं बाबा के मंदिर गई थीं औऱ पापा रोज की तरह अपनी दुकान पर। मैं घर पर अकेली थी और अवसर का लाभ उठाकर मैंने अलमारी से वह सारे गहने ले लिए थे जो माँ ने बड़े जतन से मेरे लिए बनवाएं थे।

कितनी ख्वाहिशें संजोए हुए थी वह मेरी शादी के लिए। मैंने कुछ नगदी भी ले ली औऱ अपने सारे डॉक्युमेंट्स के साथ ज़रूरी चीज़े व कपड़े रख लिए थे। प्यार सच में अंधा ही होता है। मुझें भी तब कुछ दिखाई नहीं दिया।

शांतनु के प्रेम में मैंने अपने मम्मी – पापा का दिल तोड़ दिया। दिल ही क्यों …उस दिन घर छोड़ने के साथ मैंने उनका भरोसा भी तोड़ दिया था औऱ छोड़ आई थी उन्हें तड़पते , सिसकते हुए ।

मेरी हालत की जिम्मेदार मैं स्वयं हूं।  यह मेरे उन्ही कर्मो का परिणाम है जिन्हें मैं रोज़ भुगत रहीं हुँ।

मेरे माथे पर सर्द मौसम के बावजूद पसीने की बूंदे छलक आई थीं। ख़ुद को जलता हुआ सा महसूस किया मैंने।

कांता अपनी साड़ी से हाथ पोछते हुए मेरे सामने खड़ी थीं। वह बोली भाभीजी आज मुझें एडवांस में रुपये मिल सकते हैं क्या ? आपसे ऐसा बोलते हुए अच्छा तो नहीं लग रहा पर आज मेरी माँ का जन्मदिन है तो सोचा कुछ अच्छा सा तोहफ़ा दे दूं।

कांता के शब्द मुझें बर्फ़ से शीतल लगें। जैसे जलते अंगारों पर किसी ने ठंडे पानी को छिड़क दिया। मैंने कांता को रुपये दिए औऱ कहा – इस बार तोहफ़ा मेरी तरफ़ से। ये रुपये न तो तुम्हारे मेहनताने से काटूंगी और न ही कभी वापस लुंगी।

कांता प्यारभरी निगाह से मुझें देखती रहीं । उसके होंठ कुछ कहने के लिए हुए पर वह कुछ भी न कह सकी। बस हाथ जोड़े निःशब्द खड़ी रहीं। मैंने उसके हाथों पर अपने हाथ रखें औऱ कहा – जाओ , देर हो गई तो तोहफा नहीं खरीद पाओगी। ठंड में मार्किट जल्दी बंद हो जाते हैं।

आँखों मे नमी पर होठों पर मुस्कान लिए कांता चली गईं।  मैं फिर से अपनी तन्हाई के साथ अपने दर्द पर खूबसूरत यादों से मरहम लगाने लगीं।

वो दिन कितना सुंदर था जब मम्मी का पचासवां जन्मदिन था। मैंने औऱ पापा ने मिलकर सरप्राइज पार्टी प्लान की थी। जन्मदिन के एक दिन पहले जब मम्मी सो गई थी तब सारी रात जागकर मैंने औऱ पापा ने घर को मम्मी की पसन्द के ऑर्किड के फूलों से सजाया था।

 एक शाम

वैदेही वैष्णव

घर के गहरे चॉकलेटी पर्दों की जगह मम्मी की पसन्द के महीन टिशू जैसे सफ़ेद रंग के पर्दे लहरा रहें थे।
हॉल के पिलर को फूलों की लड़ियों से लपेटा गया था। दरवाजों पर वंदनवार बांधे गए थे।

औऱ सबसे सुंदर तो तोहफ़ा था जो हमने मकराना से मंगवाया था। मम्मी के लिए साईं बाबा की संगमरमर की बड़ी सी सुंदर मूर्ति थीं ।

पापा औऱ हम दोनों ही इतने उत्सुक थे कि रात कब गुज़र गई पता ही नहीं चला। सुबह छः बजे पूर्व की औऱ गहरी लालिमा लिए आसमान खूबसूरत लग रहा था। ऐसी ही लालिमा मेरी औऱ पापा की आंखों में थी क्योंकि हम दोनों रातभर सोए नहीं। मैं औऱ पापा हॉल में सोफ़े पर बैठे हुए मम्मी के आने का इंतजार कर रहें थे।

मम्मी नहाकर जब अपने रूम से बाहर निकले तो साज-सजावट देखकर हैरान हो गए। वह गर्दन घुमाकर चारों औऱ देखने लगें। तभी उनकी नज़र नीचे कि ओर हॉल में बैठे पापा औऱ मुझ पर पड़ी। मम्मी से नज़र मिलते ही हम दोनों खड़े हो गए।

मैंने अपना गिटार संभाला औऱ जन्मदिन की शुभकामना की धुन बजाने लगी पापा साथ मे गाने लगें – ” हैप्पी बर्थडे टू यु …हैप्पी बर्थडे टू यु…हैप्पी बर्थडे टू डिअर रीना…हैप्पी बर्थडे टू यु।

मम्मी हैरानी से हम दोनों को देखते हुए भावुक हो गई। उनकी आँखों के कोर से ख़ुशी के आँसू ढुलक गए। तेज़ी से सीढ़ियों से उतरते हुए वह हम दोनों के पास आई। मुझें गले से लगाया फिर मेरा माथा चूमते हुए बोली – थैंक यू माय प्रिंसेस ।

पापा गले को साफ़ करते हुए बोले – भई , यहाँ किंग भी खड़े है।

मम्मी उनकी इस बात पर शर्माते हुए बोली – ” आप भी न , हर वक़्त ठिठोली सूझती है।”

पापा बोलें – ” लो जी ! सारी रात जागकर आपके लिए घर को ताजमहल से भी सुंदर सजाया औऱ हमे मिला क्या ? एक झिड़की..

पापा की इस बात से हॉल हम तीनों की हँसी से गूंज उठा । मम्मी को हम उनके तोहफ़े के करीब ले गए तो सुनहरी चमकीले कपड़े को उन्होंने बहुत उत्सुकता से उठाया औऱ मूर्ति देखकर वह हतप्रभ रह गई। उस एक पल में सैकड़ो दुआएं दे दी थी उन्होंने मुझें औऱ ढेर सारा प्यार उड़ेल दिया था।

यादों का समुंदर जिसे मैं अपने दिल में समेटे हुए थी अब मेरी आँखों से बह रहा था। मम्मी – पापा के साथ बिताए गए लम्हें कितने खूबसूरत थे । हर लम्हें में सिर्फ़ प्यार था ।

शाम कबकी ढल चूंकि थी औऱ रात गहरा गई थीं। रात के क़रीब एक बज रहें थे। सर्द हवा की सांय – सांय औऱ झींगुर का शोर सुनाई दे रहा था। मैं पलंग पर लेटे हुए शांतनु के आने का इंतजार करते हुए सो गई।

एक तेज़ मार से मेरी नींद खुली तो देखा हाथ मे बेल्ट लिए शांतनु खड़ा था। मैं डरी-सहमी हड़बड़ाकर उठी तो खींचकर बैल्ट का एक औऱ वार मेरे पैरों पर निशान छोड़ता हुआ लगा।

वह चीख़ते हुए बोला – ” सारा दिन सोती रहती हो। काम कुछ होता नहीं। “

बैल्ट की मार का दर्द इतना अधिक था कि मैं कुछ सुनने समझने की स्थिति में नहीं थी। गहरे नीले पड़े निशान को अपने हाथों से दबाए मैं चुपचाप बैठी रहीं। पैर पटकता हुआ शांतनु कमरे से बाहर चला गया।

इन गहरे नीले निशानों की तो अब मुझें आदत सी हो गई थी । पर दिल के ज़ख्म हरे हो उठे जिन्हें सहना दुश्वार हो रहा था। असहनीय थी यह पीड़ा। मैं वैसे ही बैठी रहीं।

थोड़ी देर बाद हाथ में कटोरी लिए कमरे में शांतनु आया। मेरे सामने बैठता हुआ वह बोला – दर्द हो रहा है…? मेरे पैर को अपनी तरफ़ खींचता हुआ वह बोला – क्यों करती हो ऐसा कुछ जिससे मुझें तकलीफ़ हो , गुस्सा आए। तुम्हें पता है न तुमसे कितना प्यार करता हूँ ।

मुझें नहीं पसन्द की कोई तुम्हें देखें। बोला था न कि खिड़कियों पर हमेशा पर्दे लगाकर रखा करो। मुझें नहीं पसन्द उस पड़ोसी का तुम्हारे हाथ के बने खाने की तारीफ़ करना। खाना बच जाए तो फेंक दो पर उस लड़के को मत दो।

मैं शांत होकर शांतनु को देख रही थी । वह नीचे मुँह किए हुए मेरे जख्मों पर मल्हम लगा रहा था।

काश ! मैं उसे बता पाती कि यह प्यार नहीं है।
प्यार स्वतंत्र रखता है , उसमें एकदूसरे की ख़ुशी सर्वोपरि होतीं है। प्यार कोई बंधन या खूंटा नहीं जिस पर हम अपने प्रेमी को किसी पालतू जानवर की तरह बांध दे ।

प्यार में एकदूसरे पर अटूट भरोसा होता है । बिना शब्दों के बातें हो जाती है। दूर होकर भी हमेशा पास रहने का अहसास बना रहता है। औऱ भी बहुत कुछ था जो मैं कहना चाहती थी पर कह ना सकी ।

मैं अपलक शांतनु को देख रही थी तभी उसने गर्दन ऊपर उठाई औऱ मुझें देखा तो उसकी आँखें मेरे चेहरे पर ठहर गई। अपनी दोनों हथेलियों पर मेरे चेहरे को रखतें हुए वह बोला – मधु , बहुत भोली हो तुम आजकल के लोगों को बिल्कुल नहीं जानती। उसने मेरे माथे को चूमा तो एक चुभन सी मेरे पूरे शरीर मे महसूस हुई।

अब नहीं पिघलता मेरा मन उसकी बाहों में आकर। नहीं मिलता वो सकून उससे गले लगकर । दूरियों की एक लंबी लक्ष्मण रेखा खींच गई थी हम दोनों के बीच जो गहरी खाई बनती जा रही थी। उसका प्यार करना भी अब मुझें खिलवाड़ सा लगने लगा था। कभी – कभी लगता जैसे कोई हैवान मेरे शरीर को बोटी-बोटी करके नोंच रहा हो…

रात बीत गई औऱ सुबह हो गई। एक नई सुबह , नया दिन , नई शुरुआत । पर मेरी सुबह – शाम एक सी रहतीं। हर दिन एक सी दिनचर्या ।

रात को प्यार जताने वाले शांतनु पर सुबह पता नहीं कौन सा भूत सवार हो जाता। उठते ही बड़बड़ाने लगतें औऱ मन किया तो हाथ उठाकर अपने मन को तसल्ली दे देतें।

ऑफिस के लिए देरी उनकी अपनी ढीलपोल से हुई लेकिन बम मेरे सिर ही फूटा औऱ बिना बात के मेरे गाल पर तमाचा जड़ दिया। जिसके निशान बहुत देर तक रहें।

कांता के आने का समय हो गया था। मैंने अपना दाहिना गाल छुपाने के लिए दुपट्टा सिर पर ओढ़ लिया। डोरबेल भी बज ही गई। मैंने दरवाजा खोला तो हँसती हुई कांता खड़ी हुई थीं। तभी हवा का एक झोंका आया जिससे दुपट्टा मेरे सिर से सरककर मेरे कांधे पर आ गया। हँसती हुई कांता अचानक गम्भीर हो गईं। शायद उसने गाल पर छपे निशान देख लिए थे। वह बिना कुछ कहे चुपचाप किचन में चली गई।

मैं भी घर की साफ़-सफ़ाई में जुट गई। कांता अपना काम ख़त्म करके चली गई। जाते हुए उसकी आँखों मे मैंने अपने लिए सहानुभूति को देखा था। बहुत कुछ कह रही थी उसकी आँखें पर लिहाज़ के कारण शब्द मुँह पर अटक रहें थे।

कांता के जाने के बाद मैं भी अपने काम में व्यस्त हो गई। खाना खाकर मैं टीवी देखने लगीं। तभी डोरबेल सुनाई दी। इस वक़्त डोरबेल बजने से मेरे हाथ पैर फूलने लगे। अनजान डर मन मे घर करने लगा कही पड़ोसी लड़का सब्जी मांगने तो नही चला आया ? कही शांतनु ही तो नही आ गया..?

शांतनु के ख़याल से ही मैं सहम गई औऱ कांपते पैरों से दरवाज़े कि ओर गई। मैंने डरते हुए दरवाजा खोला तो देखा कांता खड़ी थीं। मैंने लड़खड़ाती जुबान से पूछा – ” आज इतनी जल्दी आ गई ..?”

वह फुर्ती से अंदर आई औऱ मेरे हाथ मे ट्रेन का टिकट पकड़ाते हुए बोली – ” भाभीजी ये आपके शहर का टिकट है । शाम की ट्रेन है । आप जल्दी से तैयार होकर यहाँ से अपने घर चले जाओ।

बिना मेरी ओर देखे वह एक सांस में कहते जा रही थीं। अपनी साड़ी के पल्लू से एक गांठ खोलते हुए उसमे से दो हज़ार का नोट निकालकर मुझें देते हुए बोली यह आपके रास्ते के खर्च के लिए।

मेरी तो कुछ समझ नहीं आ रहा था। वह मुझें झकझोर कर बोली – जल्दी करो भाभीजी । भैया आ गये तो आफ़त हो जाएंगी।

मैंने अचकचाकर कहा – प…प..पर मम्मी – पापा अब भी नाराज़ रहे तो मैं कहाँ जाऊँगी ?

वह विश्वास दिलाते हुए बोली – कोई भी माता-पिता अपने बच्चों से इतने नाराज़ नहीं होते की अपने कलेजे के टुकड़े को यूं तड़पता हुआ जानकर भी न अपनाएं। आप जाओ तो सही ।
आपके इस फ़ैसले से क्या पता आपके लिए तड़पते उनके दिलों में भी जान आ जाएं ?

भाभीजी आपका हाल सब जानतें है। मैंने भी कई बार बात करना चाही पर हिम्मत नहीं हुई।आज सुबह जब आपकों देखा तो मेरा दिल दहल गया। आपने मेरी माँ के लिए एक दिन तोहफ़े के रुपये दिए थे। आज मैं भी एक माँ को तोहफे में  उसकी बेटी लौटाने की कोशिश कर रहीं हुँ। कांता टिकट औऱ रुपये देकर वहाँ से चली गई।

मैं धर्मसंकट में थीं । मन उलझ रहा था इस गुत्थी में कि मम्मी – पापा मुझें माफ़ करेंगे भी या नहीं।
कांता ने जो हिम्मत मुझमें भर दी यह उसका ही असर था कि हमेशा डरी-सहमी रहने वाली मैं निर्भीक हो गई। मैंने अपने गहने , डॉक्युमेंट्स लिए औऱ स्टेशन कि ओर कदम बढ़ा दिए।

एक सुबह मैंने अपने प्यार के लिए माता-पिता का घर छोड़ा था। एक शाम को मैंने अपने माता-पिता के पास वापसी के लिए प्यार का घर छोड़ दिया।

ट्रैन की विंडो सीट पर बैठी मैं शाम का मज़ा ले रही थीं । आसमान हल्का गुलाबी था। सूर्य की किरणों से तपते दिन के बाद शाम कितनी शीतलता लिए होती है । अनंत आकाश में स्वतंत्र उड़ते , चहकते पक्षियों का झुंड अपने घर को जा रहा था मेरी ही तरह । यह एक शाम वाकई सुहानी थी मेरे लिए।

छुक-छुक करती रेलगाड़ी सरपट पटरी पर दौड़ रहीं थीं। हवा के ठण्डे झोंके अपनेपन का अहसास दिला रहें थे। मन मे आशंका औऱ असंख्य विचारों का भंवर जाल बन रहा था।
कब नींद लग गई पता ही नहीं चला।

सुबह रेलगाड़ी के रुकने से जो झटका लगा उससे मेरी नींद खुली। मुझें लगा शांतनु ने फिर से मार के साथ जगाया था। मैं हड़बड़ाकर उठी तो देखा ट्रेन अपने लास्ट स्टॉप मेरे अपने शहर जयपुर खड़ी थीं ।

आँखों मे चमक लिए मैं ट्रेन से उतर गई। मैंने स्टेशन के बाहर निकलकर रिक्शा लिया। रिक्शा उन्हीं गलियों , चौबारों से निकलता हुआ मेरे घर के ठीक सामने खड़ा हो गया। मैंने रिक्शा वाले भैया को रुपये दिए और घर के सामने खड़ी हो गई।

घर का दरवाजा बंद था। बंद दरवाजा मेरे दिल की धड़कनों को बढ़ा रहा था। घर कि ओर बढ़ते क़दम मन में डर भर रहे थे। ठुकरा दिए जाने का डर , धोखा देकर वापस घर आने का डर , दिल तोड़ने का डर। डरते—डरते मैंने डोरबेल बजाने की बजाय दरवाजा खटखटा दिया।

उस तरफ़ से आती तेज़ कदमों की आहट मुझें साफ़ सुनाई दे रही थीं। दरवाजा खुला औऱ उसी के साथ मम्मी का मुँह भी खुला का खुला रह गया।

सामने दूध वाले छगन भैया की जगह मुझें देखकर मम्मी हैरान हो गई। उनके हाथ से पतीला छूट गया। जिसका शोर सुनकर पापा दौड़े चले आए । मुझें देखकर वह वहीं ठिठक गए।

मैं मम्मी के गले लग गई। मम्मी ने मुझें कसकर गले लगा लिया औऱ फूट-फूट कर रोने लगीं।

मम्मी पापा कि ओर मुड़ी औऱ उनसे कहने लगी – मैं न कहती थी .. हमारी गुड्डडन एक दिन जरूर लौटेंगी। मैं दौड़कर पापा से लिपट गई। पापा ने मेरे सिर पर हाथ फेरा फिर आँखों को पोछते हुए बोले – तू क्या गई यहाँ मेरी तो शामत आ गई । रोज़ बेस्वाद खाना मजबूरी में निगल रहा था तेरे आने के इंतज़ार में। एक बार फिर से हम तीनों के ठहाकों से घर का कोना-कोना गूंज उठा ।

 

लेखिका
वैदेही वैष्णव

अन्य कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें—

कहानी-बुधिया

भ्रम के बाहर

सवाल है नाक का

चाबी

फेसबुक दोस्त

Related Posts

Leave a Comment

मैं अपने ब्लॉग kahani ka kona (human touch) पर आप सभी का स्वागत करती हूं। मेरी कहानियों को पढ़ने और उन्हें पसंद करने के लिए आप सभी का दिल से शुक्रिया अदा करती हूं। मैं मूल रुप से एक पत्रकार हूं और पिछले सत्रह सालों से सामाजिक मुद्दों को रिपोर्टिंग के जरिए अपनी लेखनी से उठाती रही हूं। इस दौरान मैंने महसूस किया कि पत्रकारिता की अपनी सीमा होती हैं कुछ ऐसे अनछूए पहलू भी होते हैं जिसे कई बार हम लिख नहीं सकते हैं।

error: Content is protected !!