सन्दूक

लेखिका दीप्ति मिश्रा

by teenasharma
सन्दूक

सन्दूक

‘कहानी का कोना’ में पढ़िए लेखिका दीप्ति मिश्रा की लिखी कविता ‘सन्दूक’…। इस सन्दूक में रखे एहसास आपको बुदबुदाएंगे तो कभी यादों की झिलमिल करती दुनिया की सैर कराएंगे..। दीप्ति मिश्रा युवा लेखिका है और विभिन्न पत्र—​पत्रिकाओं में इनकी रचनाएं प्रकाशित हुई हैं।

 

देखा है मैंने माँ का वह पुराना ‘सन्दूक’
जो उसे उसके ब्याह में मिला था

कुछ मायके और कुछ ससुराल की
ढेरों यादें समाई हैं उसमें

देखा है मैंने माँ का वह पुराना ‘सन्दूक’
वो मेरी छठी का ‘छटूलना’

अब भी वहीं ‘सन्दूक’ के तले में पड़ा था
और मेरे वो छोटे छोटे चक्की चूल्हा

वो भी वहीं से चिढ़ाने लगे मुझे
माँ की दादी सास के हाथ का बना 

सन्दूक

दीप्ति मिश्रा

थालपोश भी था, जिसके बिखरे मोती
समेटे भी न जा रहे थे लेकिन

सन्दूक में वो आराम से था
हाँ, मैंने देखा है माँ का वह पुराना ‘सन्दूक’

घर परिवार, पति बच्चों के बीच पिसती माँ
अपनी खीज हम बच्चों पर उतारती और

हर रोज़ कहती “चली जाऊंगी कहीं”
लेकिन उस कहीं वो आजतक ना जा पाई और

ठूँसती रहीं वो यादें, वो खीज इस सन्दूक में
कुछ सिक्के और पुराने मुड़े तुड़े नोट भी थे रखे थे एक रुमाल में लिपटे

न जाने कब, कैसे, कितने जतन से छिपाए होंगे
हाँ, देखा है मैंने माँ का वह पुराना ‘सन्दूक’

कुछ बुने हुए नमूने भी तो थे, जिनकी
डिजाइन के स्वेटर हमने पहने थे

कुछ पुरानी फोटो और कुछ के नेगेटिव तक
सम्भाल रखे थे उस सन्दूक में

न हिम्मत हुई न ही मन, उन यादों को निकाल फेंकने का
सिर्फ देखा ही नहीं, महसूस भी किया है मैंने वह सन्दूक

हाँ, देखा है मैंने माँ का वो पुराना ‘सन्दूक’

 

(छठी पर बच्चे को पहनाए जाने वाले कपड़े)

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मैं अपने ब्लॉग kahani ka kona (human touch) पर आप सभी का स्वागत करती हूं। मेरी कहानियों को पढ़ने और उन्हें पसंद करने के लिए आप सभी का दिल से शुक्रिया अदा करती हूं। मैं मूल रुप से एक पत्रकार हूं और पिछले सत्रह सालों से सामाजिक मुद्दों को रिपोर्टिंग के जरिए अपनी लेखनी से उठाती रही हूं। इस दौरान मैंने महसूस किया कि पत्रकारिता की अपनी सीमा होती हैं कुछ ऐसे अनछूए पहलू भी होते हैं जिसे कई बार हम लिख नहीं सकते हैं।

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