पधारो म्हारे देश

पुस्तक लोकार्पण समारोह

by teenasharma
पधारो म्हारे देश

 ‘नारी कभी ना हारी लेखिका साहित्य संस्थान’ जयपुर की ओर से ‘पुस्तक लोकार्पण समारोह’ आयोजित किया गया। प्रसिद्ध लेखिका डॉ. सूर्यबाला ने डॉ. उषा कीर्ति राणावत की पुस्तक ‘पधारो म्हारे देश’ का लोकार्पण किया।

इस अवसर पर डॉ.सूर्यबाला ने कहा कि, महिलाओं को अपने आराम के समय में से कटौती कर, लिखना व पढ़ना पड़ता है…। उनके सामने लेखन में चुनौतियां हैं, फिर भी वे बेहतर काम कर रही हैं….।

पधारो म्हारे देश

 समारोह में  लेखिका  डॉ. सूर्यबाला ने ये कहते हुए सभी का दिल जीत लिया कि ‘गुलाबी नगरी’ में ही इतनी आत्मीयता संभव हैं।

पधारो म्हारे देश

लेखिका डॉ. सूर्यबाला

संस्थापक अध्यक्ष वीना चौहान ने बताया कि डॉ. उषा कीर्ति राणावत की पुस्तक ‘पधारो म्हारे देश’ का लोकार्पण किया गया। डॉ. राणावत ‘विल्सन कालेज’ मुम्बई में हिन्दी की पूर्व विभागाध्यक्ष रही है। इनकी अब तक कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।उन्होंने संस्थान के बारे में कहा कि, पिछले कई समय से निरंतर रचनात्मक दिशा में काम कर रहा हैं। इसका मकसद है महिलाओं को लेखन व साहित्य के प्रति प्रेरित करना।

मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार नंद भारद्वाज एवं विशिष्ट अतिथि प्रबोध कुमार गोविल ने उपन्यास के विभिन्न बिंदुओं के बारे में बात की।

पधारो म्हारे देश

नारी कभी ना हारी लेखिका साहित्य संस्थान’ जयपुर

इस अवसर पर डॉ. प्रीति राणावत ने ”पधारो म्हारे देश” पर नृत्य कर समा बाँध दिया…। जिसे देख तालियां गूंज उठी।
मंच संचालन डॉ. रानी तंवर ने किया। वहीं नीलम सपना शर्मा ने धन्यवाद दिया।

इस मौके पर डॉ.सुधीर सोनी, अश्विनी शर्मा, रूकमणी भारद्वाज, शारदा शर्मा, मंजू कपूर, आशा शर्मा , कमलेश शर्मा, निर्मला गहलोत, साधना रस्तोगी, विनय प्रभा जैन, शीलवंत कौर, नन्दिनी पंजवानी, पार्वती भगवानी, माला कौशल रमाभाटी, अनिता सिंह, आशा सक्सेना समेत कई लेखक व साहित्यकार जुटे।

मिलकर काम करें ‘लेखक—प्रकाशक’

कविता ‘नई पौध’

गूंगी कविता….

 ‘प्रतीक्षा है कविता’…

 

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मैं अपने ब्लॉग kahani ka kona (human touch) पर आप सभी का स्वागत करती हूं। मेरी कहानियों को पढ़ने और उन्हें पसंद करने के लिए आप सभी का दिल से शुक्रिया अदा करती हूं। मैं मूल रुप से एक पत्रकार हूं और पिछले सत्रह सालों से सामाजिक मुद्दों को रिपोर्टिंग के जरिए अपनी लेखनी से उठाती रही हूं। इस दौरान मैंने महसूस किया कि पत्रकारिता की अपनी सीमा होती हैं कुछ ऐसे अनछूए पहलू भी होते हैं जिसे कई बार हम लिख नहीं सकते हैं।

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