कदम—कदम पर हाथरस...

अब समाज को ही उठाना होगा कदम

   दिल्ली में निर्भया के साथ हुई दरिदंगी और गैंगरेप के बाद पूरा देश उबाल पर था। देश के हर कोने कोने से आक्रोश चरम पर था। जगह—जगह पर धरने प्रदर्शन हुए और सभी की एक मांग थी आरोपियों को कड़ी से कड़ी सजा दी जाए और देश में अब बलात्कारियों के खिलाफ सख्त कानून बनाया जाए। क्या हुआ... निर्भया के दोषियों को सजा दिलवाने में उसके मां—बाप को आठ साल लग गए और कड़े कानून बनने के बाद भी क्या इन दरिंदों की हैवानियत में कोई कमी आई ? क्या इन पिछले आठ सालों में इस तरह की घिनौनी वारदातों में कोई रोक लगी 

       
   आज उसी तरह उत्तर प्रदेश के हाथरस में एक युवती के साथ जो दरिंदगी हुई हैं उस पर देशभर में जबरदस्त गुस्सा हैं। देश के कई हिस्सों से लोग आरोपियों पर सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। विभिन्न संगठनों द्वारा इस बेटी को न्याय दिलाने के लिए हजारों कैंडल जलाए जा रहे हैं। इंसाफ पाने के लिए नारेबाजी की जा रही हैं। सोशल मीडिया पर भी कई तरह की टिप्पणियां की जा रही हैं।

    लेकिन कब तक ये ही एक सिलसिला इस देश में चलता रहेगा? कब तक बलात्कार होते रहेंगे और पीड़िता को न्याय दिलाने के लिए लोग यूं ही सड़कों पर उतरते रहेंगे?
   आज सवाल सिर्फ एक हाथरस की दलित बेटी का नहीं हैं। बल्कि ये सवाल हैं हर जाति और धर्म में पैदा हुई बेटी का हैं जो आज ख़ुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर रही हैं।  
     
   ऐसे में बेहद शर्मसार कर देते हैं वे लोग जो देश की बेटी के साथ हुई दरिंदगी में भी जात—पात की राजनीति कर रहे हैं... शर्मसार कर रही हैं ऐसी सियासतें जो मौका वाली पॉलिटिक्स को भुनाने में लगी हैं... किस तरह से सियासी दल ऐसे दु:ख के अवसरों पर भी अपना वोट देख लेते हैं और एक—दूसरे पर छींटाकशी करने से बाज नहीं आते और ख़ुद को पीड़िता और उसके परिवार का हमदर्द बताते हैं। यदि मकसद देश की बेटी के लिए आवाज़ उठाना हैं तो फिर ये दिखावा और ये शोर क्यूं।

   

        हाथरस की दरिंदगी के बाद देशभर के अलग—अलग स्थानों से भी रेप और गैंगरेप की घटनाएं सामने आई है। जिसे सुनकर पूरा देश सन्न हैं। 
          बलरामपुर में एक और दिल दहलाने वाली घटना सामने आई हैं। दरिंदों ने एक 22 साल की दलित छात्रा का अपहरण कर उसके साथ गैंगरेप किया। उसकी कमर और दोनों टांगे भी तोड़ दी। कुछ घंटों बाद उसकी मौत हो गई। वहीं राजस्थान के बांसवाड़ा में एक किशोरी का अपहरण के बाद गैंगरेप कर उसकी हत्या कर दी गई। यही हाल मप्र के जबलपुर के शहपुरा क्षेत्र में भी एक मासूम बच्ची का हुआ। इसका भी पहले अपहरण फिर गैंगरेप और फिर हत्या। ये सिर्फ दो—चार घटनाएं नहीं हैं बल्कि ऐसेे कई मामले लगातार बढ़ रहे हैं।

      अब तो कदम—कदम पर हाथरस जैसी घटनाओं की तस्वीरें सामने आ रही हैं। ऐसे में सवाल तो अब भी यही जवाब मांग रहा हैं आखिर कब थमेगी ऐसी हैवानियत?


     यदि नेशनल क्राइम रिकॉर्डस ब्यूरो के आंकड़ों पर नजर डालें तो आंकड़े बताते हैं कि देश में हर एक घंटें में औसतन 4 बलात्कार होते हैं। जबकि 4 घंटें में एक सामूहिक बलात्कार होता हैं। और ऐसे मामलों में राजस्थान देश में अव्वल हैं। ऐसे में एक सवाल ये भी उठता है कि जिस तरह से राजस्थान में भी गैंगरेप और हत्या के मामले निकलकर सामने आ रहे हैं उस पर भी आक्रोश होना तो वाजिब हैं लेकिन यहां इंसाफ का शोर मौन क्यूं हैं। शायद इंसाफ मर गया हैं और सियासत जिंदा हैं।
   
    ऐसे में सवाल अब भी यही शेष हैं कि आखिर कब थमेगा बलात्कार के आंकड़ों का ये सिलसिला?

      तो क्या बेटियां यूं ही दरिंदों का शिकार होती रहेगी? इस घिनौने अपराध को अंजाम देने वालों को बचाने के लिए यूं ही पुलिस और प्रशासन रातों रात बेटियों की लाशों का अंतिम संस्कार कर देगा ? मीडिया में वायरल हुए प्रशासनिक अधिकारी का पीड़ित परिवार के साथ इस तरह से धमकी भरे लहजे में बात करना...रेप की पुष्टि नहीं होने पर सवाल खड़े करना... कहीं ना कहीं पीड़ित परिवार के जख्मों पर नमक छिड़कना जैसा हैं...

 हालांकि कई महत्वपूर्ण मेडिकल जांच आना बाकी हैं लेकिन क्या रेप के अलावा उस मासूम के साथ हुई दरिदंगी कानून की भाषा में कोई मायने नहीं रखती।

    लोकतांत्रिक व्यवस्था में क्या सियासत के पास ही है इस सामाजिक कलंक को मिटाने का समाधान? क्या समाज के भीतर समाज के लोग ही नहीं निकाल सकते हैं इसका हल।


    ऐसी घटनाओं के बाद दरिंदों के लिए आमतौर पर नरपशु, जंगली जानवर और जंगलराज जैसे शब्दों का इस्तेमाल भी किया जा रहा हैं। लेकिन ये सोचने की बात हैं क्या वाकई जानवर इस तरह की हैवानियत करते हैं। जानवरों का अपना कोई धर्म नहीं, उनका अपना कोई संविधान नहीं हैं, उनकी सुरक्षा के लिए कोई पुलिस बल नहीं हैं लेकिन प्रकृति के अस्तित्व के स्वाभाविक नियमों या प्रणाली को मानते हुए वे समरसता से जीते हैं। कोई भी जानवर अपनी सीमा नहीं लाघंता। ऐसे में मनुष्य रुपी दरिंदों को जानवर कहना इस जाति के लिए अपमान होगा।

     इसलिए ऐसी घटनाओं के खिलाफ आवाज उठाना...धरने और प्रदर्शन के माध्यम से सरकार को जगाना ... सब जायज हैं... लेकिन क्या लगता हैं पिछले कई सालों से हो रहे इसी तरह के प्रयासों और आंदोलनों से इस तरह की वारदातों पर अंकुश लग पाया हैं... हां कुछ समय तक मीडिया की सुर्खियों में जरुर रहता हैं लेकिन समय के साथ—साथ यह घटनाएं देश के लोगों की आंखों से धुंधली पड़ती जाती हैं।

    इसलिए अब समय आ गया हैं...इसका जवाब हमें खुद से ही तलाशना होगा...अब वक्त आ गया हैं कि इसका हल हमारे बीच में से ही निकालना होगा...इस नासूर हो चुकी बीमारी को ठीक करने के लिए अब पूरे देश के हर समाज..हर धर्म को उठ खड़ा होना होगा। क्योंकि बेटी तो हमारी ही हैं ना, तो उसकी सुरक्षा और उसकी हिफाजत की जिम्मेदारी भी हमारी हैं।  

  

    ना कोई जाति ना कोई धर्म। बस एक लक्ष्य बेटियों को बचाना हैं। फिर चाहे इसकी जो कीमत चुकानी पड़े। यह तभी होगा जब हर कोई हर किसी की बेटी को अपनी बेटी समझे। फिर तो स्कूल से अकेली सड़क पर आ रही बेटी को पान वाले में अपने अंकल सब्जी बेचने वाले में अपने चाचा और पास से गुजर रहे आटो चालक में अपना बड़ा भाई मिल जाएगा।

  

    बस शर्त यहीं है हर कोई हर बेटी को अपनी बेटी मान ले अपनी बहन मान ले। जिस दिन इस सोच की क्रांति आ जाएगी उस दिन बेटियों की सुरक्षा के लिए पुलिस, प्रशासन और सरकार के मोहताज नहीं होंगे। ये एक 'आदर्श परिस्थिति' हैं जिसके लिए सभी को मानसिकता बदलनी होगी।



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Ruby Purkayastha

2 years ago

कुसंस्कार से भरे समाज कंठको से देश की महिलाओं की रक्षा की ठोस व्यवस्था की जाए. ईमानदार प्रयास अति आवश्यक. आज हर समस्या का राजनीतिकरण भी बेहद चिंता का विषय है.

Teena Sharma 'Madhvi'

2 years ago

आपका यह कहना एकदम सही भी है

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