मेरी 'चाहतों' का घर...

दफ्तर की खिड़की से झाँकता हुआ सूरज ठीक मेरे सामने कुछ इस तरह आ गया मानों कह रहा हो अलविदा ! कल फिर आऊँगा । मैं टकटकी लगाए हुए डूबते सूरज को देखती रहीं । अस्त होता सूरज दिल में सूनापन भर देता हैं । धीरे - धीरे से सरकता हुआ सूरज पश्चिम दिशा में ऐसे दुबक गया मानो अपने घर चला गया हों । घर को जाते पँछी जब झुण्ड बनाकर आसमान में दिखते तो लगता मुझसें कह रहें हो तुम किसके साथ घर जाओगी ?  

टीना शर्मा


घर सबकों जाना होता है फिर चाहें वो पँछी हो या सूरज ! मुझें सूरज का आना औऱ जाना दोनों पसन्द हैं क्योंकि सूरज अकेले ही आता हैं औऱ अकेले ही चला जाता हैं बिल्कुल मेरी तरह !

मुझें क़भी अपने सहकर्मियों को साथ आते जाते देखकर कोफ़्त नहीं हुई फिर आजकल क्यूँ मैं किसी लव बर्ड को देखकर चिढ़ने लगीं हुँ । जो जिंदगी मैं जी रहीं हुँ यहीं तो मेरा सपना था। फिर क्यों मन में वो संतोष नहीं हैं ?इस सफ़ल जिंदगी को जीने के लिए मैंने कितने पापड़ बेले थें ? कितनी ही इच्छाओं का गला घोंट दिया था ?

मुझें तो प्यार औऱ शादी जैसे लफ़्ज़ से भी चिढ़ हुआ करतीं थीं । फिर अब क्यों मुझें किसी साथी की कमी महसूस होतीं हैं । मेरे दिल औऱ दिमाग के बीच द्वंद चलने लगा दिमाग कहता जो जिंदगी जी रहीं हो यह हर किसी को नसीब नहीं होतीं । आज यहाँ नहीं होती तो कहीं चूल्हा फूंक रहीं होतीं । 

इस पर दिल कहता इन सफलताओं औऱ महत्वकांक्षाओं की मंजिल क्या यह अकेलापन हीं थीं ? मन में आए विचारों के उफ़ान पर अंकुश मेरे बॉस की आवाज़ ने लगाया। 

वह मेरे केबिन के दरवाजे से खुद को टिकाकर दोनों हाथ बांधे हुए खड़े थे औऱ मंद- मंद मुस्कुरा रहें थें ।

" बधाई हों मिस मालिनी " - प्रमोशन हो गया हैं आपका औऱ 20% सेलेरी भी बढ़ा दी गई हैं । 
ऐसे ही काम करतीं रहों । औऱ हाँ आज जल्दी घर चली जाना औऱ पार्टी करना - कहते हुए सर वहा से चले गए ।

" पार्टी " किसके साथ ? मैंने अपने आप पर ही तंज कसते हुए मुस्कुरा कर खुद से ही कहा।

    बड़े शहरों में , गगनचुंबी इमारतों के बीच , लगातार भागती हुई , दूधिया स्ट्रीट लाइट से रौशन सड़को पर सफ़र करतें लगभग सभी सफल व महत्वाकांक्षी लोगों का जीवन मेरी ही तरह होता हैं - " तन्हा सफ़र " । भीड़ में भी अकेलापन हमेशा साथ रहता हैं।

    विचारों की उधेड़बुन में मैं कब पार्किंग लॉट में पहुँच गयी पता ही नहीं चला । अपने पर्स से मैं अपनी चमचमाती मेहरून कलर की " किया सेल्टॉस " गाड़ी की चाबी ढूढ़ने लगीं । यह गाड़ी मैंने पिछले महीने ही लोन पर ली थीं । गाड़ी को स्टार्ट करके मैं अपनी ही धुन में खोई हुईं गाड़ी ड्राइव कर रहीं थी कि एक वाकये से मेरी हँसी फुट पड़ी ।

हुआ यूं था कि जब मैंने गाड़ी के लोन के लिए फाइनेंस कम्पनी से बात की थीं तो कम्पनी से लोन एक्सिक्यूटिव मेरे दफ्तर ही चला आया था। 
वह फॉर्म को स्वयं भर रहा था मैं फॉर्म से सम्बंधित जानकारी उसे मुहैया करवा रहीं थीं । तभी उसने मुझसें पूछा - मैरिड या अनमैरिड ?

प्रश्न तो सरल औऱ सीधा था पर मैं इस प्रश्न से उस पर बिफ़र गई थीं । आप फॉर्म रख दीजिए मैं खुद भरकर आपके ऑफिस भेज दूँगी।

जब हम किसी बात से दूर भागते हैं या जिससे बचना चाहतें हैं तब वहीं किस्सा या बात हमारे सामने जाने - अनजाने आ जाती हैं। मेरे साथ भी कुछ यहीं हो रहा था।

घर पहुँचते ही मैंने मम्मी को कॉल लगाया औऱ अपने प्रमोशन की बात बताई। मम्मी खुश तो हुई पर उतनी नहीं क्योंकि यह मेरी पहली सफलता नहीं थीं । मम्मी की खुशी तो अब मेरी शादी हो जाने पर दुगनी होगीं ।

मम्मी - पापा जब भी कॉल करतें तब उनके पास जैसे दूल्हों की लिस्ट बनीं रहतीं। मेरी शादी के अलावा औऱ कोई बात उन्हें सूझती ही नहीं। मैं भी झल्लाकर कह देतीं - अगर आपको लगता हैं कि मैं बोझ हुँ तो फिर कही भी रिश्ता तय क्यों नहीं कर देतें । मेरी पसन्द - नापसंद की जहमत भी क्यो उठाते हैं आप ?

इस पर मम्मी कहती - " तू तो हमारी राजकुमारी हैं " बेटा हर माता - पिता का यह सपना होता हैं कि वह अपनी राजकुमारी के हाथ पीले करके किसी राजकुमार को सौंप दे ।

मैं मम्मी की आवाज़ में अक्सर उनके दुःख को महसूस करतीं । इसलिए इस बार मैंने मम्मी से कह दिया - " अच्छा ठीक हैं आप लड़के देखना शुरू कीजिए जब कोई पसन्द आ जाये तो मुझें बता दीजियेगा "

मम्मी मेरी इस बात पर खुश हो गई औऱ फिर मेरे फोन की गैलेरी दूल्हों के फोटो से सज गई । 

मम्मी के कहने पर ही रिंकी मौसी ने मुझें समाज के एक मॅट्रिमोनी ग्रुप में भी एड कर दिया था।

   समय मिलने पर जब भी मैं ग्रुप को देखती तो लगता ग्रुप नहीं कोई दूल्हा - दुल्हन का बाजार लगा हुआ हो । सबके फ़ोटो के साथ पसन्द - नापसंद , गुण , गोत्र औऱ भी बहुत सी जानकारी लिखी हुई रहतीं। 

पसन्द आए तो स्टार करते जाओ औऱ नहीं तो फिर स्क्रोल करो औऱ आगे बढ़ जाओ। मैंने भी कुछ लड़के शॉर्टलिस्ट किये औऱ बेमन से सिर्फ मम्मी की ख़ुशी के लिए मम्मी के नम्बर पर फॉरवर्ड कर दिए।

हम जब अपनों की ख़ुशी के लिए समझौता करतें हैं तब अक्सर हम अंदर से टूटकर बिखर जाया करते हैं । समझौते होते ही ऐसे हैं। यह अक्सर एक को ख़ुशी औऱ दूसरे को तकलीफ़ दे जाते है।

मैंने फ्रीज़ से अपनी फेवरेट मैंगो आइसक्रीम निकाली औऱ अपना मन हल्का करने के लिए टीवी ऑन कर लीं । टीवी पर एड आ रहा था - "जीवनसाथी डॉट कॉम का" । 

एक पिता सेहरा लिए हुए लड़के के पीछे दौड़ लगा रहे थें । बरबस ही मेरी उँगलियाँ रिमोट के लाल बटन पर चली गई औऱ बटन प्रेस होते ही टीवी स्विच ऑफ हो गई। रिमोट को सोफ़े पर फेंक कर मैं बॉलकनी में आ गईं। मेरे हाथ में पिघलती आइसक्रीम को देखकर मुझें महसूस हो रहा था जैसे मेरा दिल पिघल रहा हों ।

तभी मेरे मोबाईल पर मैसेज बीप बजी। मैंने मोबाइल देखा तो मेरे स्कूल के क्लास टीचर अमित पांडेय सर का मैसेज था । सर ने एक कार्ड व्हाट्सएप किया था जिसमे बेंच नंबर 2004 के विद्यार्थियों के लिए आयोजित मिलन समारोह के लिए निमंत्रण था। कार्ड के नीचे कैप्शन में सर ने लिखा था पति व बच्चों को भी लेकर आ सकते हैं ।

 कैप्शन मानो मुझें चिढ़ा रहा हों । मैंने फोन को रख दिया औऱ बॉलकनी में लगे रातरानी के पौधें को निहारने लगीं। रातरानी की भीनी - भीनी खुशबू मुझें सुकून दे रहीं थीं औऱ एक सबक भी की अकेले अपने दम पर भी वातावरण को महकाया जा सकता हैं जिसके लिए अन्य पोधों की तरह सूर्य प्रकाश का होना जरूरी नहीं हैं ।

मैंने रातरानी से नजरें हटाई औऱ अनंत आसमान को ताकने लगीं। असंख्य तारों के बीच अकेला चांद अपनी चाँदनी को धरा पर छिटक रहा था। 
तभी फोन की घण्टी बजी। मेरी स्कूल फ्रेंड संजना का फोन था। मैंने कॉल रिसीव किया।

" हेलो मिस मालिनी " - संजना ने चहकते हुए कहा।
हेलो संजना ! हाऊ आर यु ? कॉल्ड ऑफ्टर सेवरल डेज ...

संजना - हाँ , अमित सर ने इनविटेशन कार्ड सेंड किया था । तू भी आ रहीं हैं न ?
हम्म ! देखती हूँ - मैंने बूझे मन से कहा ।

संजना से बात करने के बाद मैं सोने चली गई । कल मुझें जल्दी उठना हैं , क्योंकि मुझें कल प्रेजेंटेशन देना हैं।
नई सुबह अपने साथ कितना कुछ लेकर आती हैं।
नया दिन , नया उत्साह , नई उमंग , नई ताज़गी औऱ ख़ूब सारी सकारात्मक ऊर्जा !

मेरी बॉलकनी से पेड़ों की झुरमुट से झाँकता हुआ सुर्ख लाल सूरज ऐसा लग रहा था मानो मुझसे कह रहा हो - गुड़ मॉर्निंग मालिनी ! मैं फिर आ गया अपना जादू का पिटारा लेकर । वाक़ई सूरज किसी जादूगर से कम नहीं होता हैं । एक तिलिस्म हैं सूरज के उगने औऱ ढलने में । 

सुबह का सूरज ऐसा होता हैं मानो कोई युवा अपने तेज़ से पूरे विश्व को जला देगा । औऱ शाम को वहीं सूरज ऐसा लगता हैं जैसे कोई वृद्ध अपने अनुभव सुना रहा हो।

मैंने बॉलकनी में अपनी पसन्द के पौधे लगा रखें थे जिन्हें मैं सुबह ही पानी औऱ खाद दे दिया करतीं हुँ। दफ्तर जाने के बाद मेरा घर में प्रवेश रात 8 या 9 बजे हुआ करता।

आज मैं रोज़ के मुकाबले कुछ ज़्यादा ही ख़ुश थीं। प्रमोशन के बाद मेरा पहला प्रजेंटेशन जो था। मैं नियत समय पर ऑफ़िस पहुँची। सामने से बॉस आते दिखे। मुझें देखकर बॉस ने कहा - गुड मॉर्निंग मालिनी ! आर यू रेडी फ़ॉर योर प्रजेंटेशन ?

" वैरी गुड मॉर्निंग सर ! यस सर आई ऍम रेडी " - मैंने पूरे जोश के साथ कहा ।

" गुड ! ऑल द बेस्ट " - कहकर बॉस वहाँ से चले गए औऱ मेरे कदम भी मीटिंग हॉल की औऱ बढ़ गए ।

पूरे तीस मिनट तक मेरा प्रेजेंटेशन चला । प्रेजेंटेशन की समाप्ति के बाद मीटिंग हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा । मीटिंग में इंटर्न भी थे। मीटिंग हॉल से बाहर निकलते समय मुझें पीछे से किसी लड़की ने आवाज़ दी। 
      मैंने मुड़कर देखा तो बीस - बाईस उम्र की लड़की दौड़कर मेरी औऱ आ रहीं थीं जो इंटर्न थीं । मेरे नजदीक आकर लेटर पेड मेरी औऱ बढ़ाकर वह बोली - " मेम ऑटोग्राफ प्लीज " 

" ऑटोग्राफ " ??  मैंने आश्चर्यभरी निगाहों से उसकी औऱ देखा । उसकी आँखों में तैरते हुए सपनों को मैं साफ़ देख पा रहीं थीं ।
वह मुझसें बोली - मेम मुझें भी बिल्कुल आपकी तरह बनना हैं ।

मैं मुस्कुरा दी। उसके हाथ से लेटर पेड लेकर मैंने अपने हस्ताक्षर कर दिए। औऱ साथ में एक नोट लिख दिया - " यू आर द बेस्ट व्हॅन यु आर जस्ट लाइक यु " 

लड़की खुश होकर लेटर पेड को देखती रहीं । 
     
       मैं अपने कैबिन में आ गई औऱ चाय ऑर्डर कर दी। मेरी आँखों के आगे अब भी उस लड़की का चेहरा घूम रहा था। उसे देखकर बीती बातें मेरे जेहन में दौड़ने लगीं । मैं भी कभी उस लड़की की तरह ही थीं । बीस बरस की उम्र में बस यहीं चिंता सताए रहतीं थीं - ' करियर की गोते खाती नाव डूबेगी या मंजिल के पार पहुँचेगी ' ?

      बीस की उम्र कब गुज़र गई औऱ तीस की उम्र ने कब दस्तक दे दी पता ही न चला । तभी केबिन के दरवाजे के खटखटाने की आवाज़ से मेरे विचारों की तन्द्रा टूटी । हाथ में ट्रे लिए मोहन भैया खड़े थे । चाय मेरी टेबल पर रखतें हुए वो बोले - मेम आप कहे तो स्नेक्स भी ले आऊं ?

" नो थेंक्स " कहकर मैंने चाय का प्याला उठा लिया ।
आज का दिन थकावट भरा रहा । दफ्तर में नई जिम्मेदारीया मुझें प्रमोशन के साथ उपहार स्वरूप मिल गई थीं।

    आज तो डूबते सूरज को अलविदा कहने का भी समय नहीं मिला। न ही घर जाते पंछियों के कलरव ने मुझ पर कोई तंज कसा । व्यस्तता मुझें इसीलिए पसन्द थीं । क्योंकि व्यस्त रहने पर समय का पता ही नहीं चलता है। मुट्ठी से फ़िसलती रेत की तरह समय भी जल्दी गुज़र जाता हैं ।

रात करीब 9 बजे मैं अपने फ्लैट पर पहुँची । बैग को सोफ़े पर रखकर मैं भी वहीं निढ़ाल होकर बैठ गईं । अपने दोनों पैर मैंने टी टेबल पर रख दिये थें । कुछ देर आँखे बंद किये हुए मैं शांत मन से लेटी रहीं । तभी मोबाइल वाइब्रेशन साउंड सुनाई दिया। मुझें याद आया आज मैंने फ़ोन को वाइब्रेट मॉड पर रख दिया था। मैंने तुरंत बैग से मोबाइल निकाला । 

20 मिस्ड कॉल थे। जिनमे 5 मिस्ड कॉल तो मम्मी के ही थे। मैंने मम्मी के नम्बर डायल कर दिए । मम्मी ने पहली रिंग पर ही कॉल रिसीव कर लिया। वह चिंतित होकर बोली - "क्या बात हैं कॉल रिसीव क्यों नहीं किये " ?

मैंने हसँकर मम्मी से कहा - " 20 % सेलेरी यूँ ही थोड़े बढ़ाई होंगी उसके ऐवज में काम भी तो 20 % बढ़ाया होगा न "

मम्मी - " ओफ्फो तेरी ये ऑफिस की बातें " 
ख़ैर ! तूने जिन लड़को के फ़ोटो मुझें सेंड किये थे उनमें से मुझें तीन पसन्द आये हैं। एक तो अपनी रिंकी के रिश्ते में ही लगता हैं। मैंने उसके माता - पिता से बात कर ली हैं। वो लोग अगले सप्ताह ही आने का कह रहें हैं। तो सप्ताह भर की छुट्टी ले औऱ घर आ जा।

मम्मी का तुगलकी फरमान सुनकर मैंने कहा - " पर मम्मी मेरा हाल ही में प्रमोशन हुआ हैं , मुझें इतने दिनों की छुट्टी नहीं मिल पाएंगी ।

वैसे छुट्टी मिलना मेरे बाएं हाथ का खेल था पर मैंने टालने के लिए मम्मी से झुठ कह दिया। पर मम्मी भी सीबीआई से कम न थीं । मेरे झूठे बहाने औऱ दलीलें उनके सामने विफ़ल हो गए।

मुझें याद आया कि स्कूल रीयूनियन की पार्टी भी तो अगले सप्ताह ही हैं । इसी बहाने पुराने दोस्तों से मिलना भी हो जाएगा। मैंने बेंगलुरु टू भोपाल की फ्लाइट की टिकिट बुक करवा ली।

अगली सुबह ही मैंने अपने बॉस को मेल किया औऱ एक सप्ताह की छुट्टी सेंशन करवा ली। 

मुझें सबसे ज़्यादा फिक्र बॉलकनी में रखे अपने पौधों की थीं जो मुझें अपनी जान से ज़्यादा प्यारे हैं । मैंने सभी गमलों में ड्रिप इरिगेशन मैथड अप्लाई कर दी ताकि सप्ताहभर गमलों की मिट्टी में नमी बनीं रहें ।

इसके बाद मैंने अपनी पैकिंग शुरू कर दी । कार्ड्स , मोबाईल चार्जर , मेडिसिन किट  औऱ मेरी पसन्द के आउटफिट्स सारे ज़रूरी सामान रखने के बाद मैं नहाने चली गईं । सारा दिन मैंने ख़ुद के कामो में ही बिताया। रोजमर्रा के ऑफिसियल लूक़ को बदलकर मैं फिर से वहीं मालिनी बन जाना चाहतीं थीं जैसी मैं 19 - 20 बरस में हुआ करतीं थीं।

शाम सात बजे मेरी फ्लाइट थीं । मैंने घड़ी पर नज़र डाली। 6 बजकर 15 मिनट हो रहें थे । अपने शहर जाने की बेताबी से धड़कते हुए मेरे दिल की धड़कनें घड़ी की सुईयों की टिकटिक के साथ चल रहीं थीं। मैंने एक बार अपने आप को आईने में देखा फिर आदतन अपने बैग को एक बार फिर से चैक किया । सभी जरूरी सामान जस का तस रखा हुआ था । 

फ्लैट को लॉक करके मैं लिफ़्ट की औऱ बढ़ गईं । G बटन को प्रेस करतें ही लिफ़्ट ग्राउंड फ्लोर पर आ गई । मैंने एयरपोर्ट जाने के लिए कैब बुक कर ली थीं । लगभग 25 मिनट के बाद मैं एयरपोर्ट पर थीं । बैगेज चेकिंग औऱ सिक्योरिटी चेक के बाद मैं अपनी सीट पर जाकर बैठ गईं ।

मेरी सीट के ठीक सामने वाली कतार में नवविवाहित कपल बैठा हुआ था। लगभग 26- 27 वर्षीय युवक किसी बात पर अपनी पत्नी को चिढ़ा रहा था औऱ उसकी पत्नी का मुहँ गुब्बारे की तरह फुला हुआ था। लड़के ने लड़की के कान में कुछ कहा , जिस पर चिढ़कर लड़की ने अपनी कोहनी मारते हुए उसकी बात का खण्डन कर दिया। औऱ वह उठकर मेरी तरफ़ आने लगीं । 

उसे अपनी तरफ़ आया देखकर मैंने अपनी नज़रे हैंडबैग पर टिका दी औऱ मैंने हैंडबैग की ज़िप खोलकर उसमे से कुछ तलाशने का नाटक किया।
वह मेरे क़रीब आकर बोली - " क्या मैं आपके पास बैठ सकती हूँ " ? 
" मुझें तो कोई एतराज नहीं " - मैंने मुस्कुराते हुए कहा ।


वह मेरे पास आकर बैठी ही थीं कि सीट के असली दावेदार आ गए। लड़की ने उन्हें अपनी सीट पर बैठ जाने के लिए निवेदन किया औऱ वह सहजता से मान गए ।

मैं प्लेन की खिड़की की कनखनियो से बिखरे बादलों को देखने लगीं। सफ़ेद मुलायम बादल बिल्कुल रुई की तरह लग रहें थें। तभी मेरे बग़ल में बैठी वह लड़की बोली - हेलो ! माय नेम इज़ मालिनी , व्हाट इज योर गुड नेम ?

" स्ट्रेंज " - मेरा नाम भी मालिनी हैं ।
बातूनी अँखियों वाली उस लड़की ने अपनी आँखों में चमक लाते हुए मुझें पिंच कर दिया औऱ बोली - " सैम पिंच " ।

मुझें लड़की की इस हरकत पर हल्का सा गुस्सा आया पर मेरा गुस्सा जल्दी ही चाय के कप से निकली भांप की तरह उड़कर गायब हो गया।

मुझें देखकर मेरी वास्तविक उम्र का पता कर पाना लगभग सभी के लिए मुश्किल था। वह लड़की भी मुझें उसका हमउम्र समझ बैठी थीं । मेरे बिना कोई प्रश्न किये ही वह अपने बारे में बताने लगीं थीं । 

वैसे मैं सफ़र में अक्सर मैगज़ीन पढ़ना पसंद करतीं हुँ पर यह पहली बार हुआ जब मुझें कहानियां ऑडियो वर्सन में सुनने को मिल रहीं थीं । लड़की को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ रहा था कि उसकी बातों में मेरी दिलचस्पी हैं भी या नहीं ?

अपनी आँखों को मटकाते हुये वह रोचक ढंग से अपनी कहानी मुझें सुना रहीं थीं । हवाई सफ़र ही मेरा सपना हुआ करता था। मैं एयरहोस्टेस बनना चाहतीं थीं । मुझें सपनों की उड़ान भरकर पूरा विश्व देखना था। लेक़िन किस्मत में कुछ औऱ ही लिखा था। 

पापा माने नही औऱ अपने दोस्त के बेटे से मेरी शादी कर दी। मेरे पति भोपाल में नोकरी करतें हैं। वो मुझें कबसे इसी बात के लिए छेड़ रहें थे कि अब तो आपके पँख काट दिए गए हैं औऱ मुझ जैसे लड़के के साथ खूंटे से बांध दी गई हो जो तुम्हारे सपनों को चाहकर भी पूरा नहीं कर सकेगा।

उस लड़की की बात सुनकर मैं विचारों की दुनिया में खो गई। मेरा दिमाग गर्व से मुझसें कहने लगा - देखा , ये होता हैं वैवाहिक जीवन। इस पर दिल ने कहा - ये तो सिक्के का एक ही पहलू हैं , दूसरा पहलू तो ये हैं कि इस लड़की को प्यार करने वाला एक अच्छा जीवनसाथी भी मिला हैं।

लड़की मुझें झकझोरते हुए बोली - " अरे आप कहाँ खो गई " ?
" कही नहीं " - मैंने शांतभाव से कहा ।

वह मुझसे मेरे बारे में पूछने लगीं। मैंने उसे संक्षेप में अपने बारे में बताया। मेरी बात को सुनकर वह अपनी आँखों को बड़ा करते हुए बोली - इतनी कम उम्र में इतनी सफलता अर्जित कर ली आपने ? औऱ एक मैं हुँ ।

मैंने उसे अपनी वास्तविक उम्र बताई तो वह मानने को तैयार ही नहीं हुई। वह बोली - लाइफ हो तो ऐसी । आप अब भी 24 - 25 की दिखती हैं । सफलता जिसके क़दमो को चूम ले उसके लिए तो एक से एक लड़को की लाइन लग जाए शादी के लिए। 

आपकी शादी तो बिना आपकी मर्ज़ी के तय कर पाना सम्भव ही नहीं होगा न ? उसने कातर निग़ाहों से मेरी तरफ़ इस कदर देखा मानो वह कोई हलाल कर दिया गया बकरा हो।

उसके प्रश्नों की झड़ी से मैं बस मुस्कुरा दी। वह अचानक चुप हो गई । जैसे उसके भीतर विचारों का मंथन हो रहा हो। मैंने भी मैगजीन उठाई औऱ पेज पलटने लगीं । तभी मेरी नज़र उस लड़की के पति पर पड़ी जो दूर से ही इशारों में लड़की को चिड़ा रहा था। जब उस लड़के ने मेरी औऱ देखा तो वह झेंप गया औऱ हड़बड़ी में मैग्जीन उठा कर पढ़ने लगा। 

इन दो अजनबी लोगों ने कई दिनों से मेरे अंतर्मन में चल रहें द्वंद को खत्म कर दिया। मुझें अपने कई सवालों का जवाब सहजता से हीं मिल गया था। मैं अपनी ज़िंदगी से अब बेहद खुश थीं औऱ मुझें यकीन हो गया था कि कही कोई राजकुमार मेरा इंतज़ार कर रहा होगा। 

जो मेरी ही तरह सफ़ल होगा , जिसके आचार - विचार मेरी तरह होंगे। जिसके साथ होने से मैं यह महसूस नहीं करूँगी की मुझें किसी खूंटे से बांध दिया गया हैं । हम दोनों का एक छोटा सा संसार होगा जहां अकेलापन दूर - दूर तक नहीं होगा। अनंत आकाश की तरह हमारे आसमानी सपने होंगें , जहाँ सिर्फ प्रेम होगा।

जिस तरह टेक ऑफ़ के समय ज़मीन से उठता हुआ प्लेन मेरे मन को रोमांचित कर रहा था ठीक उसी तरह टच डाउन के समय जब प्लेन के पहियों ने मेरे अपने शहर भोपाल की ज़मीन को छुआ तो एक सरसरी सी तरंग किसी स्वर लहरी की माफ़िक मेरे शरीर में दौड़ने लगीं । औऱ जिसके यू दौड़ने से मेरे दिल के तार बज उठें थे। टच डाउन के समय लगा जैसे लौट आई हूँ अपने पुराने संसार में । अब यादों के गढ़े ख़ज़ाने को खोदूँगी औऱ अपने पुराने दिनों को फिर से जीभरकर जियूंगी ।

मैं अब राजाभोज एयरपोर्ट पर खड़ी थीं ।  मैंने चारों औऱ नज़र दौड़ाई । मेरी नजरे किसी उत्सुक छोटे बच्चे की तरह मानो सब जगह दौड़ कर मुआयना कर आई थीं । सब कुछ वैसा ही था जैसा मैं लास्ट विजिट पर छोड़कर गई थीं । हवाएं अपनेपन का पैगाम ला रहीं थीं । बहुत सुकून था इस पल में ।

एयरपोर्ट से बाहर निकलकर मैंने टेक्सी लीं। टेक्सी की खिड़की से मैं इस तरह सटकर बैठ गई मानो पूरे शहर को सिर्फ देख लेने भर से ख़ुद में समेट लूँगी। ज़्यादा कुछ नहीं बदला था। बस कुछ दुकानें जो छोटी थी अब बहुत ऊंची हो गई थीं । लगता हैं उन दुकानों का भी प्रमोशन हो गया था।

रात क़रीब 9 : 30 बजे मैं अपने घर पहुँची । घर के लोहे के गेट के पास की क्यारी में मेरे द्वारा लगाई हुई चमेली की बेल अब बहुत फैल गई थीं।उसकी शाखाएँ हवा के झोंकों से लोहे के गेट के बाहर आती ऐसी जान पड़ती थीं मानो मेरे घर आने पर आगे बढ़कर मेरा स्वागत कर रहीं हो ।

मैंने गेट खोला औऱ उसकी आवाज़ सुनकर पापा दौड़कर बाहर आए , उनके पीछे आरती की थाल लिए मम्मी भी आई।

आरती की थाल को देखकर मैंने खुद से ही प्रश्न किया - " यह स्वागत मेरे घर आने पर हैं या फिर शादी के लिए मान जानें पर " ----?

कभी - कभी मम्मी मुझें बिल्कुल हिंदी फिल्मों के आलोकनाथ की तरह लगतीं ।

खैर,  स्वागत सत्कार के बाद मैं मम्मी - पापा से मिली। अपने घर आकर मुझें लग रहा था जैसे मैं स्वर्ग में आ गई हुँ । मैं कोई परी हुँ औऱ अपने मैजिक विंग्स से यहाँ - वहाँ उड़ती फिरूँगी।

मम्मी ने मेरी पसन्द के दाल बाफले औऱ लड्डू बनाए थे साथ में पुदीना औऱ धनिया की चटनी भी थीं। बहुत दिनो बाद मम्मी के हाथ का बना हुआ खाना ख़ाकर मैं अपनी डायटिंग को भूल ही गई।

मैंने इतना ज़्यादा खा लिया था कि शायद हाजमोला की गोली भी मुझें नहीं बचा सकती थीं। घर आकर मैं भूल ही गई थीं कि मैं किसी मल्टीनेशनल कंपनी की वॉइस प्रेसिडेंट हुँ ।

मेरी बातों में सधे हुए औपचारिक शब्द न होकर मालवी भाषा की मिठास घुल गई थीं । मेरे पास तो सिर्फ ऑफिस की ही चर्चा थी जिसको सुनने में मम्मी की दिलचस्पी नहीं थीं । पर मम्मी के पास तो बातों का पिटारा था जिसमे से कभी हँसी के गुब्बारे निकलतें तो कभी कोई गम्भीर बात।

2 घण्टे के इंडिगो फ्लाइट के सफ़र से लेकर घर तक मैं सिर्फ सुन ही रहीं थीं। मुझें सुनना अच्छा लग रहा था। इन पलों को मैं बेंगलोर में बहुत मिस करतीं थीं । देर रात तक मैं औऱ मम्मी जमानेभर की बातें करतें रहें । जैसे आज ही सारी बातें कर लेना बहुत जरूरी था। जब मैं औऱ मम्मी दोनों थककर चूर हो गए तब हम नींद के आग़ोश में कब  खो गए पता ही नहीं चला। 

सुबह करीब 10 बजे मेरी नींद खुली । कमरे की खिड़कीयो पर लगे पर्दों की औट से झाँकता सूरज मुझसे कह रहा था। दिन चढ़ने को आया हैं ! अब उठ भी जा ! अलसाई सी मैं हॉल में जाकर बैठ गईं । पापा पेपर पढ़ रहें थे औऱ मम्मी किचन में थीं । मम्मी ने किचन से ही आवाज़ लगाकर मुझसे कहा चाय ले आऊं ? मैंने कहा - " नही पहले मैं ब्रश करूँगी " ।

थोड़ी देर बाद मैं नहा - धोकर किचन में गई । मैंने अपनी चाय गर्म की औऱ वहीं किचन स्टेण्ड पर खाली जगह पर चढ़कर अपने पैरों को लटकाए हुए बैठ गई। एक समय था जब में मैं इसी जगह पर बैठकर मम्मी के किचन कार्यो में मदद किया करतीं थी।

मम्मी ने मुझसे कहा - बेटा वो लोग आज दोपहर 12 : 30  या 1 बजे तक आएंगे। तू तैयार हो जाना।

शुक्र हैं मम्मी ने यह बात मेरी चाय खत्म होने के बाद कही थीं वरना मेरी चाय का मज़ा ही किरकिरा हो जाता। मैंने मम्मी से कहा - " इतनी भी क्या जल्दी थी ? अभी तो मैं सप्ताहभर यहाँ हुँ " 

मम्मी ने आँखों मे चमक लाते हुए कहा - " इसीलिए तो आज बुलवा लिया उन लोगों को ताकि लड़का पसन्द आते ही इसी सप्ताह सगाई कर दे " 

यह सुनकर तो मुझें लगा जैसे मेरे दिलरूपी नागासाकी औऱ दिमागरूपी हिरोशिमा पर परमाणु बम गिरा दिया गया हो।

मम्मी के इस तानाशाही रवैया का कोई हल भी तो नहीं था मेरे पास । अब मुझें लग रहा था कि मैं लड़का देखने नहीं किसी जंग पर जा रहीं हुँ जहाँ से मेरे अरमान जिंदा लौटकर आएंगे या फिर दफ़न हो जाएंगे।

मैं हॉल में थीं औऱ टीवी देख रहीं थीं । तभी मम्मी हँसते हुए आई औऱ घड़ी की औऱ इशारा करके मेरी तरफ़ शरारतभरी नज़रों से देखा । जैसे कह रहीं हो - आज तेरी खैर नहीं हैं बेटा।

  मैं बेमन से तैयार होने चली गईं । मेरे मन के किसी कोने में सुप्तावस्था में पड़ा हुआ बच्चा जाग गया औऱ मुझें बार - बार बेढंगा मेकअप करने को प्रेरित करने लगा। जिसको देखकर आने वाला वो लड़का उल्टे पैर ही लौट जाए। पर ऐसा कुछ भी कर पाना सम्भव नहीं था। 

मैंने अपने चेहरे पर बेसकोट लगाया उसके बाद फाउंडेशन फिर कंसीलर , थोड़ा फेस पॉउडर , आँखों पर काजल की एक पतली सी लाइन खींच दी उसके बाद पलकों पर मस्कारा अप्लाई किया। फिर होठों पर लिप ग्लास औऱ हल्की पिंक लिपस्टिक लगाई। 

माथे पर अपनी ड्रेस से मैच खाती छोटी सी बिंदी सजाई औऱ बालों में क्लचर लगा कर उन्हें खुला छोड़ दिया। अंत में अपने बनारसी दुप्पटे को कंधे पर एक तरफ़ सलीके से डाल लिया। 

मैंने इस तरह से खुद को आख़िरी बार कॉलेज की फेयरवेल पार्टी में सँवारा था। फेयरवेल पार्टी से एक चेहरा मेरी आँखों में घूमने लगा - आनंद का चेहरा ! मेरा सबसे अच्छा दोस्त । अब कहा होगा वह ? क्या स्कूल रियूनियन पार्टी में आएगा ?

तभी मम्मी कमरे में आई और नज़र न लगें कहते हुए मम्मी बलैया लेने लगीं । तभी बाहर गाड़ी की आवाज़ आई जिसे सुनकर मम्मी ने कहा - लगता है वो लोग आ गए। मैं जाती हूँ । जब बुलाऊ तब तू आ जाना। कहते हुए मम्मी फुर्ती से चली गई। 

मैंने अपने कमरे की खिड़की से देखा तो घर के ठीक सामने ब्लैक कलर की लैंड क्रूज़र गाड़ी खड़ी थीं । गाड़ी से तीन लोग बाहर निकलें । एक आंटी लगभग 45 की उम्र की , 50 के लगभग उम्र के एक अंकल औऱ मेरी ही उम्र का एक हैण्डसम नोजवान था। मम्मी - पापा हाथ जोड़कर उनकी आवभगत करतें हुए मेज़बानी कर रहें थें। वे लोग अब घर में प्रवेश कर चूंके थे। थोड़ी ही देर बाद मम्मी ने मुझें बुलाया। 

मैंने अंकल - आंटी को नमस्ते कहकर अभिवादन किया औऱ खाली पड़े सोफ़े पर बैठ गईं । अंकल ने मेरे बारे में पूछताछ शुरू कर दी। मैंने अपने बारे में बताया तो वह चौकते हुए बोले - गोल्ड मेडलिस्ट हो । आंटी कहने लगीं - भई हमने तो सुना हैं पढ़ी-लिखी लड़कियां गृहकार्य में उतनी दक्ष नहीं होतीं ? क्या ये सच हैं ?

मैं कुछ कहती उसके पहले ही मम्मी ने मेरी तारीफ़ों के पुल बाँधते हुए कहा - जी हमारी मालिनी तो हर कार्य मे दक्ष हैं , ऐसा कोई काम शायद ही हो जो इसे न आता हो। पढ़ाई के साथ - साथ खेलकूद , मेहंदी , रंगोली , चित्रकारी सब कला में अव्वल रहीं है। दीवारों की औऱ हाथ को घुमाते हुए मम्मी ने कहा - ये सारी पेंटिग्स मालिनी ने ही बनाई हैं ।

आंटी बोली - बहुत बढ़िया ! दीदी ये तो आपके संस्कार हैं जो आपने अपनी बेटी को सर्वगुण सम्पन्न बनाया हैं। हमे अपने बेटे सुदर्शन के लिए ऐसी ही लड़की की तलाश थीं।

मम्मी इस बात पर इतनी ख़ुश हुई कि उठकर मिठाई की प्लेट आंटी की औऱ इस कदर कर दी मानो रिश्ता पक्का ही समझो ।

अंकल मुझसें बोले - देखों बेटा , बात ये हैं कि हमारे बाप- दादाओं ने इतनी सम्पत्ति छोड़ दी कि हमारी सात पुश्ते भी अगर मतकमऊ निकले तो भी आरामदायक जिंदगी जी ले। सुदर्शन का पढ़ाई में शुरू से ही मन कम लगा। वह तुम्हारे जितना पढ़ा लिखा तो नहीं हैं पर हैं तो आख़िर मालिक ही न ? पढ़ाई के बाद भी इंसान करता तो जॉब ही हैं।

मैं इस बात पर कुछ नहीं बोलीं । लेक़िन मम्मी - पापा अंकल की बात से पूर्णतया सहमत नजर आए।

आंटी बोली बेटा तुम दोनों अगर चाहो तो अकेले में बात कर सकते हो , मन में कोई प्रश्न हो तो पूछ लो ? मैंने ना में सिर हिला दिया। पर लड़का शायद मुझसे कुछ पूछना चाहता था। अगले ही पल मैं औऱ वह लड़का मेरे कमरे में थे। 

मेरी नज़रों में वह लड़का महज़ एक चाबी भरा खिलौना था। जो अपने माता - पिता द्वारा संचालित होता। माता-पिता के कहे अनुसार रहना तो बहुत अच्छी बात हैं लेकिन ख़ुद का वजूद होना भी ज़रूरी हैं।

वह लड़का मुझसे बोला । आप बैंगलोर में अकेली रहतीं हैं ?  मैंने कहा - " जी "
उसने अगला सवाल दागा - फिर तो बॉयफ्रेंड भी होगा ? मैंने कहा - " नहीं " 

वह हँसकर बोला फिर तो बेंगलुरू के सभी लड़के गधे हैं । इतनी खूबसूरत लड़की वो भी सिंगल ? 

मैं उसकी इस बात पर चुप रहीं । मैं अक्सर गुस्से पर काबू रखने के लिए मौन धारण कर लिया करतीं हूं।

लड़का बोला मेरी तो कई गर्ल फ़्रेंड्स रहीं हैं । मुझें कॉकटेल पार्टी पसन्द हैं । अक्सर पब में अनजान लड़कियों से जान पहचान हो जाया करती हैं।

खैर आपसे क्या छुपाना । मेरा ऐसा मानना हैं कि किसी भी रिश्ते को शुरू करने से पहले ख़ुद के बारे में सारे सच बता दिए जाने चाहिए। ताकि सामने वाला हम जो हैं उसी रुप में हमें स्वीकार कर सकें ।

लड़के के साथ हुई पूरी बातचीत के दौरान में मन ही मन उससे चिढ़ती रहीं पर उसकी कही सिर्फ यहीं बात मेरे दिल को छू गईं।


सुदर्शन अपने बारे में बता रहा था औऱ मैं अपने रूम की खिड़की से पश्चिम दिशा की औऱ सरकते सूरज को देख रहीं थीं।

सुदर्शन के साथ हुई बातचीत से मुझें समझ आ गया था कि यह मेरे सपनों का राजकुमार नहीं हैं ।

सुदर्शन ने मेरे हाथ में सोने के कंगन को देखकर मुहँ को सिकोड़ते हुए कहा - " यू लाइक गोल्ड " ? 
मैंने कहा - " हाँ " पर ये कंगन मम्मी के हैं।

हाऊ ओल्ड फ़ैशन ? इस बार तो सुदर्शन ने ऐसा मुहँ बनाया जैसे सोने के कंगन नहीं कोई बहुत ही बुरी सी चीज़ हों । वह बोला - मुझें तो प्लेटिनम पसन्द हैं। तुम्हें भी प्लेटिनम पहनना चाहिए। औऱ इस शूट की बजाय तुम बॉडी हगिंग ड्रेस पहनती तो औऱ भी खूबसूरत लगतीं । स्लिम फिगर हो इसलिए तुम हाई नेक औऱ पफ़ी शोल्डर वाला फ्लोर लेंथ गाउन पहन सकती थीं । अच्छा लगता तुम पर ।

सुदर्शन ख़ुद को ट्रेंडी बताने के लिए मुझें अपनी पहनी हर चीज़ के बारे में बताने लगा। ये जो घड़ी हैं न मोवाडो अल्ट्रा स्लिम ये 70 हज़ार की हैं । औऱ ये शूज़ शायद मालदीव से लिए थे प्योर लैदर 50 हजार के हैं । परफ्यूम तो मुझें फॉरेन के ही पसन्द हैं । 

सुदर्शन की बातें सुनकर मुझें लग रहा था जैसे मैं किसी शॉपिंग मॉल में हुँ औऱ सेल्समेन मुझें सामान दिखा रहा हैं उनकी कीमतों के साथ ।

मैं सुदर्शन की बातें अनमने मन से सुनती रहीं । औऱ कोई चारा भी तो नहीं था मेरे पास। आज अस्ताचल की औऱ बढ़ते सूरज की गति भी मुझें बहुत धीमी लग रहीं थीं। लगता हैं सूरज भी मेरी सगाई पक्की करके ही चेन की सांस लेगा। अभी तो 4 ही बजे हैं। सूरज तो अपने समय पर ही ढलेगा न ? मेरे मन ने मुझसे बड़ी मासूमियत से कहा ।

कमरे में मम्मी ने प्रवेश किया। ट्रे में चाय लेकर प्रफुल्लित मन से मम्मी अपने कदम ऐसे बड़ा रहीं थीं मानो सुदर्शन नहीं साक्षात विष्णुजी ही आज हमारे घर आ गए हो।

मम्मी के आने से मैंने राहत की सांस ली। मम्मी सुदर्शन से बात करने लगीं औऱ मैं चाय की चुस्कियों में खो गई। चाय खत्म करके हम लोग हॉल में आ गए।

15 - 20 मिनट बात करने के बाद उन लोगों ने हमसे विदा लीं। उनकी तरफ से रिश्ता पक्का था।
मम्मी - पापा उन्हें गेट तक छोड़ने गए। मैं सोफ़े पर बैठी रहीं।

अब सिर्फ मेरे हाँ कहने भर की देरी थीं औऱ चट मंगनी पट ब्याह हो जाता। मैंने मम्मी- पापा से स्पष्ट शब्दों में कह दिया - " यह मेरे जीवन से जुड़ा फैसला हैं। मैं जल्दबाज़ी में कुछ भी नहीं कहूँगी। मुझें थोड़ा वक़्त चाहिए " 

यह कहकर मैं अपने रूम में आ गई । मन माफ़िक़ कोई काम या चर्चा न हो तो उसमें शामिल होंने पर हम बिना किसी श्रम के भी बहुत थक जाते है । आज की दिनचर्या ने मुझें भी थका दिया था। मैं ड्रेस चेंज करने के बाद सो गई।

शाम के 6 बजे मेरी नींद मंदिर की घण्टी बजने से खुली। मैं हाथ-मुहँ धोकर नीचे हॉल में गई । मम्मी दियाबत्ती कर रहे थे औऱ पापा टीवी देख रहे थे जिसमें राम कथा का प्रसारण चल रहा था। कितना सुखद पल था ये। बैंगलोर में तो इस समय मैं ऑफिस में रहतीं औऱ वहाँ कहाँ सुनाई देतीं हैं मंदिर की घण्टियाँ ? वहाँ तो बस फ़ोन की रिंगटोन , ऑफिस की टेबल पर रखी बेल की ट्रिन- ट्रिन , गाडियों के बजते हॉर्न ही इन कानो को नसीब हुआ करते हैं।

मैं भी सोफ़े पर बैठकर राम कथा सुनने लगीं । थोड़ी देर बाद ही मम्मी चाय लेकर आई ? मुझें चाय का कप थमाते समय मैंने मम्मी की आँखों मे कई प्रश्नों का सैलाब देखा। मानो मुझसे उनकी आँखे पूछ रहीं हों - क्या हुआ , कुछ सोचा ?

मेरा अनुमान बिल्कुल ठीक निकला। मम्मी ने सोफ़े पर बैठते हुए मुझसें वहीं प्रश्न किया जिसकी मुझें उम्मीद थीं। मैं कुछ कहती उसके पहले ही राम कथा में कथावाचक ने भजन गाना शुरू कर दिया जो बिल्कुल मेरी स्थिति से मेल खा रहा था। 

" सोने की लंका न मिले माँ ....अवधपुरी की धूल मिले "
भजन ने मेरे मनोबल को इस क़दर बढ़ा दिया कि मैंने हिम्मत करके सच कह दिया । 

" मुझें सुदर्शन पसन्द नहीं हैं मम्मी " - कहकर मैंने अपनी गर्दन नीचे कर ली औऱ चुपचाप चाय पीने लगीं ।

ज़ाहिर सी बात हैं मम्मी - पापा मेरे इस जवाब से उदास हुए होंगे । शायद दोनों ने उदास नज़रों से एक- दूसरे की औऱ देखा भी होगा। मैं गर्दन नीचे किए हुए ही चाय के घुट पीती रहीं । अब लग रहा था कि जीवनभर दुःख के घुट पीने से मैं बच गई ।

चाय का प्याला किनारे रखकर मैं उठी औऱ मम्मी की औऱ अपने कदम बढ़ा दिए। मम्मी चुपचाप टीवी पर आँखे गड़ाये हुए थे पर उनके चेहरे को देखकर लग रहा था मानो उनके मन मे विचारों का तूफ़ान चल रहा हों। मैंने मम्मी के घुटनो पर हाथ रखें औऱ फर्श पर बैठते हुए मैंने मम्मी से पूछा -

" आप मेरे मन मुताबिक लड़के से शादी करके मुझें खुश देखना चाहते हैं ? या अपने मन मुताबिक लड़के से शादी करवा कर अपनी ख़ुशी चाहते हैं ? "

मम्मी ने प्यारभरी निगाहों से मेरी औऱ देखा औऱ मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए कहा - बेटा तेरी खुशी मायने रखतीं हैं ।

" क्या मैं अभी ख़ुश नहीं हूँ " ? मैंने मम्मी से अगला प्रश्न किया ।

मैंने मम्मी को यक़ीन दिलाते हुए कहा - मुझें भी आजीवन अकेले नहीं रहना हैं। मैं भी चाहती हूँ मेरी शादी हो ,मेरा परिवार हो , मैं भी पर्दे औऱ कुशन खरीदूं । पर मुझें सिर्फ़ किसी रस्म औऱ रिवाज़ की तरह शादी नहीं करना हैं । चंद मिनटों में किसी अजनबी से हुई बात के आधार पर अपनी पूरी जिंदगी का फैसला नहीं कर सकती।

मैंने हमेशा आप दोनों की हर बात मानी। क़भी ऐसा कुछ नहीं किया जिसकी वजह से आपकी नजरें नीची हों । फिर आप सिर्फ लोग क्या कहेंगे ? यह सोचकर मुझें किसी के भी साथ बांध देना चाहते हो तो मैं कभी ख़ुश नहीं रहूँगी। सुदर्शन अच्छा लड़का हैं पर मेरे लिए नहीं बना हैं।

मम्मी - पापा दोनों पहली बार मुझसे सहमत दिखाई दिए। दोनों की आंखों में एक चमक थीं । शायद उन्हें गर्व था कि उनकी बेटी अपने पैरों पर खड़ी हुई हैं जिसके लिए उसके जैसा ही कोई राजकुमार आएगा।

रात कितनी शांत औऱ रहस्यमयी सी होतीं हैं ?मानो काले घने अंधेरे में न जानें कितने ही राज छुपाए हुए हों ! या यूँ कहूँ की की अंधेरों को समेटे हुए यह रात एक सबक दे रहीं हो कि फिक्र न कर उम्मीद क़ायम रख , आशा की किरण लिए एक नई सुबह आएगी औऱ गम के काले घनघोर बादल छट जाएंगे ! आज मेरी आँखों में नींद का कतरा लेश मात्र भी न था। नींद आती भी तो कैसे ? 

मम्मी - पापा को तो मैंने समझा दिया था पर ख़ुद को कैसे समझाती ? काश हम ख़ुद को बेवकूफ बना पाते ...झूठी तसल्ली या साँत्वना देकर ख़ुद को ढांढस बंधा पाते। अंदर से टूटकर बिखर जानें पर मन के टुकड़ों को सहेज पाते ...कितना मुश्किल होता हैं न ख़ुद को समझा पाना ..?

मेरे भीतर एक युद्ध छिड़ गया था । जिसमे मैं खुद को हारा हुआ सा महसूस कर रहीं थीं। मेरे भीतर अकेलेपन ने घर बना लिया था जो मुझें खोखला कर रहा था। मैं कब तक अकेली रहूँगी ? क्या मैं हमेशा अकेली ही रहूँगी ? क्या सपनो के राजकुमार की कहानियां महज़ मनोरंजन के लिए गढ़ी गई थीं ? ऐसे असंख्य प्रश्नों का भवँर मेरे मन के समुद्र में गोते खा रहा था। विचारों के बहाव में बहते हुए कब नींद लग गई मुझे पता ही नहीं चला ।

अगली सुबह मैं देर से जागी । दिन चढ़ गया था। खिड़की पर लगे महीन पर्दो से छन कर आती हुई गुनगुनी धूप मेरे चेहरे पर पड़ रहीं थीं । मम्मी दरवाजे के बाहर से ही दो बार चाय का पूछ चूंकि थीं । मैं उठी औऱ ड्राइंगरूम में चलीं गईं । पापा रेडियो लेकर बैठे हुए थे। उसके पुर्जे खोलकर वो इतनी शिद्दत से उसकी मरम्मत में लगे हुए थे मानो वो बरसों से रेडियो सुधारने का ही काम करते आये हो। मम्मी चमेली की बेल से फूल तोड़ रहीं थीं । मैं उनींदी सी सोफ़े पर जाकर बैठ गई औऱ पास में रखा पेपर उठाकर हैडलाइन पढ़ने लगी । तभी मेरी नजर पेपर पर लिखी तारीख पर पड़ी औऱ मेरी आंखों में बची हुई नींद छूमंतर हो गई। अचानक ही मुझमें किसी सुपरहीरो की तरह शक्ति आ गई। 

अरे ! आज तो स्कूल की रीयूनियन पार्टी हैं मुझें तो 12 बजे स्कूल पहुँचना हैं । मैं चिड़ियों सी फुदकती हुई अपने कमरे में आ गई । फ़टाफ़ट नहा - धोकर तैयार होकर फिर से ड्राइंगरूम में आ गई। मम्मी अब भी बाहर ही थीं । मैंने पापा से अपनी स्कूटी की चाबी मांगी तो वो बोले - बेटा कार ही ले जा । मौसम भी आज कुछ बिगड़ा हुआ हैं शायद बारिश हों... मैंने पापा का तकिया कलाम कहते हुए मुस्कुराकर कहा - " भोपाल की तंग गलियों से जब गुजरना हो तब उड़नखटोला ही काम आता हैं कार नहीं "  

स्कूटी की चाबी लेकर मैं फुर्ती से बाहर निकल गई। मम्मी मुझसें कहने लगीं - " बेटा चाय " ?
स्कूटी को स्टार्ट करके मैंने कहा - " चाय नहीं अब बाय " शाम को लौटूँगी ।

मैं स्कूल की औऱ दौड़ती हुई सड़क पर अपनी स्कूटी दौड़ा रहीं थीं । मुझें अपने पुराने स्कूल के दिन याद आ गए। कितने रूमानी थें वो दिन बिल्कुल फूलों जैसे कोमल , तितलियों जैसे चंचल, झरनों जैसे निर्मल ! ऐसे ही स्कूटी से मैं स्कूल जाया करतीं थीं। मन समुद्र की लहरों की तरह हिलोरें ले रहा था! स्कूल का यह रास्ता अब भी उतना ही सुहावना हैं। सड़क के दोनों तरफ लगें पेड़ बहुत ही खूबसूरत लग रहें थे ।आज मैं अपने सभी पुराने दोस्तों से मिलूँगी ।आज सूरज लुका- छुपी खेल रहा हैं। लगता हैं मुझसें नाराज़ हैं - कि अपने पुराने दोस्तों से मिलने जा रहीं हो औऱ मेरी तो आज कोई पूछपरख ही नहीं हुई। बादलों के पीछे छुपे सूरज की औऱ एक नज़र देखकर मैं मन ही मन मुस्काई औऱ कहा - सॉरी दोस्त आज तुम नाराज़ ही रहो ! तुम्हारी ये नाराजगी भी सर आँखों पर क्योंकि तुम्हारे यूँ छुप जानें से मौसम कितना ख़ुशनुमा हो गया हैं । 
             मौसम का मिजाज देखकर मैंने अपनी स्कूटी सड़क के किनारे रोकी औऱ फ़ोन को ब्लूटूथ से कनेक्ट करके फोन में गाना लगा दिया - मौसम मस्ताना , रस्ता अनजाना , जाने कब किस मोड़ पे बन जाये कोई अफ़साना....

गाने की समाप्ति मेरे स्कूल के गेट नम्बर 3 पर हुई। मैंने ब्लूटूथ कान से हटाया औऱ बेग में रख लिया। औऱ स्कूटी को पार्क करके मैं लाईब्रेरी से गुजरती हुई प्ले ग्राउंड के बीचों-बीच चलती हुई चारों औऱ देखते हुए बढ़ती जा रहीं थीं। वही केन्टिंग , वही प्ले ग्राउंड , वहीं पेड़ सब कुछ बिल्कुल वैसा का वैसा था जैसा 2004 में हुआ करता था। 

क्या मेरे सभी दोस्त भी वेसे के वैसे ही होंगे ? कैसी होंगी वह दुबली-पतली रीटा जिसको हम अगरबत्ती कहा करतें थें औऱ वह गोलूमोलू सा स्वप्निल जिसे सब ढोल कहते थे ? क्या हैंडसम सा दिखने वाला वो मयंक जो हीरो बनना चाहता था...वह हीरो बन गया होगा ?

बेंच नम्बर 2004 की पार्टी शिवाजी सभागृह में चल रहीं थीं। मेरे कदम शिवाजी सभागृह की औऱ बढ़ गए। सभागृह में छोटा सा म्युजिकल परफॉर्मेंस चल रहा था। कुछ लोग ग्रुप बनाकर बैठें हुए थे जो मंच पर खड़े लड़के की लय में लय मिलाकर गाना गा रहें थें । मैं हर एक चेहरे को गौर से देख रहीं थीं । संजना दौड़कर आई औऱ मुझसें लिपटकर बोली - " यक़ीन ही नहीं था कि तुम आओगी "

मैंने कहा - " भई तुमसे मिलने के लिए तो सात सुमद्र पार से भी आना पड़ता तो भी आती "

अमित सर मेरी औऱ ही आ रहे थे उनको आता देखकर मैं भी उनकी औऱ बढ़ी औऱ सर के पैर छुए तो वो भावुक होकर बोले - " तुम आज भी मेरी फेवरेट स्टुडेंट हों "

कुछ देर की झिझक के बाद सभागृह में मौजूद सभी पुराने दोस्तों से पुराने अंदाज में बात होने लगीं । हम एकदूसरे को पूराने नामों से पुकारने लगें। पर अब वह अगरबत्ती रीटा फूलकर कुप्पा हो चूँकि थीं औऱ ढोल जैसे शरीर वाला स्वप्निल सूखकर पतला पापड़ बन चुंका था। औऱ मयंक अब उतना हैंडसम नहीं रहा वह हीरो नहीं बल्कि हीरो मोटर्स कम्पनी में मैनेजर बन गया हैं।

सबसे मिलने के बाद भी मेरी ख़ुशी आधी लग रहीं थीं। मेरी नजरें हर तरफ आनंद को ढूंढ रही थीं।
आनंद से दोस्ती टूटे सालों बीत गए। मुझें कभी मलाल भी नहीं हुआ उससे दोस्ती टूट जानें पर। लेकिन आज उसकी कमी खल रहीं थीं। वह मेरा सबसे अच्छा दोस्त हुआ करता था। एक ऐसा दोस्त जिससे मैं हर बात शेयर किया करतीं थीं।

मुझें अपने ही ख्यालों में खोया देखकर संजना बोली - " ओ मैडम कहाँ खो गई , चल न कुछ खाते हैं , बड़ी जोरों की भूख लगीं हैं " 

मैं संजना के साथ फ़ूड स्टॉल की औऱ गई। संजना ने मुझसें पूछे बिना ही करेले की सब्जी मेरी प्लेट में रखते हुए कहा - "खाना चाहिए गुड फ़ॉर हेल्थ"

मैंने संजना को गुस्से से ऐसे घूरकर देखा मानो उसकी इस हरकत पर मैं उसे कच्चा ही चबा जाऊँगी। हमने खाना शुरू किया। मैंने जैसे ही करेले की सब्ज़ी का निवाला मुहँ मैं डाला - मंच से अमित सर का अनाउंसमेंट सुनाई दिया - " डिअर स्टूडेंट्स दिल थाम कर रखियेगा क्योंकि अब आ रहें हैं हमारी बेंच के किशोर कुमार " - 'आनंद उपाध्याय '

यह सुनकर करेले की कड़वाहट की जगह मेरे मुहँ में मानो मिठास घुल गई। मेरी नजरें मंच के पास लगें दरवाजे पर जा टिकी। हवा की फुर्ती सा दरवाजे से आनंद आया औऱ मंच पर चढ़ गया। माईक को हाथ में लिए हुए वह भीड़ की औऱ देखते हुए बोला - देरी से आने के लिए माफ़ी चाहूंगा दोस्तों । पहले गाना फिर खाना उसके बाद आप सबसे मुलाकात करूंगा। उसकी इस बात से सभागृह ठहाको से गूँज उठा। उसने वही गाना गाया जो वह स्कूल की केन्टिंग में गाया करता था - ओ साथी रे तेरे बिना भी क्या जीना ...


यादों की किताब जब खुलती हैं तो उसके पन्नों से अक्सर ख़ुशनुमा लम्हों की महक आती हैं । हर पलटता हुआ पन्ना दिल को एक रूमानी अहसास से भर देता हैं ।

आनंद को गाता हुआ देखकर मैं अपने अतीत में खो गई । आनंद क्लास 10th में न्यू स्टूडेंट की तरह आया था पर उसके वाचाल औऱ मिलनसार स्वभाव के कारण चंद दिनों में ही वह लगभग आधी क्लास का दोस्त बन गया था। आनंद कभी कोई क्लास बंक नहीं करता । वह हमेशा फर्स्ट बेंच पर बैठना पसंद करता था औऱ इधर - उधर की बातों पर ध्यान देने की बजाय हमेशा पढ़ाई में मशरूफ़ रहता। आनंद औऱ मेरी दोस्ती की वजह भी यहीं थीं । आनंद बिल्कुल मेरी तरह था। हम दोनों जब भी फ्री होते तो केन्टिंग में समोसे खाने जाते। केन्टिंग में हम दोनों पुरानी फ़िल्म के गीत गुनगुनाते।

साल बीतते गए औऱ हमारी दोस्ती औऱ भी गहरी होती गईं । हमने एक ही कॉलेज में एडमिशन लिया। आनंद ने मुझें कभी भी किसी बात पर ऐसा महसूस नहीं करवाया जिससे मुझें लगे कि वह मुझ पर कोई बात थोप रहा हैं । बहुत सी बातें ऐसी भी होतीं थी जहाँ हमारे विचार नहीं मिलते थे। पर आनंद हमेशा यहीं कहता कि तुम जिस नजरिये से देख रहीं हो वह भी सही हैं । हम दोनों की आपसी समझ बहुत अच्छी थी । यहीं वजह थी कि हम दोनों का कभी भी झगड़ा नहीं हुआ।

 लेक़िन 14 फ़रवरी का वह दिन हमारी दोस्ती पर काल बनकर आया था। उस दिन आनंद गुलाब के फूल औऱ कार्ड लिए मेरे पास आया था औऱ उसने कहा था - कॉलेज के एक लड़के ने तुम्हारे लिए दिया हैं। वह लड़का कौन था यह तो मुझें आज भी नहीं पता। पर मेरा गुस्सा आनंद पर ही फूटा। मैंने कार्ड औऱ फूल आनंद के मुहँ पर फेंकते हुए कहा था - किसी के मैसेंजर बनकर आए हो ? 

जबकि तुम्हें अच्छे से पता हैं मुझें इन बातों से सख्त नफ़रत हैं। आज के बाद मुझें अपनी शक़्ल भी मत दिखाना। गुस्से से आग - बबूला होकर में वहाँ से चली गई थीं । मैंने आंनद के नम्बर ब्लैक लिस्ट में डाल दिये थे। मार्च में फाइनल ईयर के एग्जाम थे जो अप्रैल फर्स्ट वीक तक चले। एग्जाम के बाद मैं अपनी नानी के घर चली गईं । परीक्षा परिणाम के समय भी मैं कॉलेज नहीं गई। मैंने यूनिवर्सिटी में टॉप किया था। उसके बाद मुझें जॉब का ऑफर मिल गया औऱ मैं बेंगलुरु आ गईं । 14 फरवरी पर जो झटका आनंद ने मुझें दिया था उस झटके से हम दोनों की दोस्ती टूट गई। न उसने कभी मुझसे बात करने की कोशिश की न मैंने ।

अतीत की कड़वी यादों ने मन को भारी कर दिया था। मुझें अपना हलक सूखता हुआ महसूस हुआ। मैं पानी लेने के लिए स्टॉल की औऱ जा ही रहीं थीं कि हाथ में पानी की बॉटल लिए हुए आनंद मेरी ही तरफ आता दिखाई दिया । मेरे नजदीक आकर उसने बॉटल को मेरी औऱ बढ़ाते हुए कहा - मुझसें फिर से दोस्ती करोगी....?


मैंने मुस्कुराकर कहा - हाँ

हम दोंनों कुर्सी पर बैठ गए। आनंद औऱ मेरी दोस्ती के समीकरण अब बदल गए थे । अब हम बेतकल्लुफी से बात नहीं कर रहें थे। सालों बाद हुई बातचीत में झिझक औऱ औपचारिकता ही महसूस हो रहीं थीं। आनंद ने कुछ देर चुप्पी साधने के बाद कहा - आई ऍम वेरी सॉरी मालिनी! मुझें उस दिन ऐसा नहीं करना था। तुमने जो गुलाब मेरे मुहँ पर मारे थे उसके काँटे भी मुझें इतने नहीं चुभें थे पर तुमसे दोस्ती टूट जानें का दंश सालों तक चुभता रहा।

"एक्चुअली मुझें भी अफ़सोस हैं उस दिन के अपने बर्ताव पर"- मैंने अचकचाकर आनंद से कहा । वो बात ये हैं आनंद कि कई बार हम दुनिया को अपने नजरिये से देखने लगतें हैं । हम इतने खुदगर्ज हो जाते हैं कि हम चाहतें हैं कि हमारे अपने हमे उसी नज़र से देखें जैसा हम चाहतें हैं।

हम्म! आनंद ने गहरी सांस छोड़ते हुए कहा ।
खैर छोड़ो , औऱ सुनाओ कैसी कट रहीं हैं ज़िंदगी ?

मैंने हँसकर कहा - जब स्कूल-कॉलेज में थीं तब लगता था मानो सपने औऱ ज़िंदगी दोनों मेरी मुट्ठी में कैद हैं। अब लगता हैं ज़िंदगी मुट्ठी से फ़िसलती रेत की तरह फ़िसल रहीं हैं। बड़े शहर में आधी अधूरी जिंदगी जीती हुँ । चॉपस्टिक से खाना सीख लिया हैं। सो कॉल्ड सक्सेसफुल ज़िंदगी से ख़ुश हुँ। तुम बताओं कुछ ?

आनंद मेरी बात पर मुस्कुरा दिया औऱ बोला - तुम बिल्कुल भी नहीं बदली। बस चेहरे पर अब वो लड़कपन नहीं हैं। अपने बारे में क्या कहूं ? तुमसे दोस्ती टूट जाने के बाद मैं भी बहुत टूट गया था। मैंने भी भोपाल छोड़ दिया औऱ दिल्ली चला गया था। अब आर्किटेक्चर हुँ । कुछ महीनों पहले पापा गुज़र गए इसलिए अब भोपाल में ही रह रहा हूँ।

मैंने दुःख करते हुए कहा - ओह बहुत बुरा हुआ। मुझें तो पता ही नहीं चला। वरना तुमसे सम्पर्क जरूर करतीं।

अचानक हम दोनों चुप हो गए। आनंद मंच की औऱ देखने लगा औऱ मैं अपने मोबाइल में देखने लगीं। मुझें सच में आनंद के लिए बहुत बुरा लग रहा था। आनंद की मम्मी उसे बचपन में ही छोड़कर चली गई थीं , जिन्हें याद करके अक़्सर उसकी आँखें गीली हो जाया करतीं थीं। आनंद कितना अकेला हो गया होगा न ? सोंचकर ही मेरा दिल किसी सूखे हुए पत्ते की तरह कांप उठा। 

मैं आनंद से एक प्रश्न पूछना चाहतीं थीं - मैरिड या अनमैरिड ?
क्रमश:

       
लेखिका - वैदेही वैष्णव " वाटिका "

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नोट— 'कहानी का कोना' में प्रकाशित अन्य लेखकों की कहानियों को छापने का उद्देश्य उनको प्रोत्साहन देना हैं। साथ ही इस मंच के माध्यम से पाठकों को भी नई रचनाएं पढ़ने को मिल सकेगी। इन लेखकों द्वारा रचित कहानी की विषय वस्तु उनकी अपनी सोच हैं। इसके लिए 'कहानी का कोना' किसी भी रुप में जिम्मेदार नहीं हैं...।  

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Unknown

1 year ago

Nice story

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