आख़री ख़त प्यार के नाम...

     
   आख़री—आख़िरी

            न जाने वक़्त कब यूं ही गुज़रता चला गया। कितना सुकून था उस पल में जब बेफिक्र सुबह और शाम थी और चांदनी रातों के तले नींद। भर पेट खाना नहीं था और नहीं पहनने को मनपसंद कपड़े...। फिर भी ​माथे पर चिंता की लकीरें नहीं थी। और आज क्या कुछ नहीं हैं पास। गाड़ी, बंगला, नौकर—चाकर फिर भी दिल के भीतर खालीपन है। काश! राजीव उस दिन ज़िद नहीं करता...लेकिन अब क्या फायदा ये सब सोचकर।


फिर भी इसी ख़्याल को ज़ेहन में लिए बैठी हैं नीलू। आज बारिश की बूंदों ने उसके चेहरे पर गिरकर उन बीते दिनों की धुंध को साफ़ कर दिया हैं। नीलू इस धुंध के पीछे जाकर राजीव को ढुंढती हैं।


   उस दिन भी ऐसी ही तेज मूसलाधार बारिश हो रही थी। राजीव और नीलू कॉलेज कैंपस में एक छाते के नीचे खड़े होकर अपने करियर और जीवन के संघर्षो पर गहरी चिंता में थे। 
  
राजीव कह रहा था नीलू हमारे पास इतने रुपए नहीं कि हम दोनों एमबीए की पढ़ाई कर सके। और फिर हम दोनों में कोई अंतर नहीं हैं। अगर डिग्री तुम्हें मिलती हैं तो भी हम दोनों का भविष्य संवर जाएगा। मैं कोई और नौकरी कर लूंगा। नीलू कहती हैं नहीं राजीव। हमने तय किया था कि हम दोनोें एक—दूसरे से अलग नहीं होंगे।

    अभी हम दोनों एक ही कॉलेज में और एक ही क्लास में पढ़ते ​हैं। खाना साथ में खाते हैं। साथ आते हैं, साथ जाते हैं। अगर मैं अकेली एमबीए करुंगी तो हम दोनों का साथ बहुत कम रह जाएगा।
 
         राजीव नीलू का हाथ पकड़ता है और उसे तसल्ली से समझाता हैं। देखो नीलू तुम एक समझदार लड़की हो। हमारे हालातों को समझो। हम दोनों का परिवार आर्थिक रुप से बेहद कमजोर है। ऐसे में यदि हम दोनों में से एक की भी पढ़ाई पूरी हो जाती हैं तो हम सभी का भला होगा। फिर तुमने ये कैसे सोच लिया कि मैं तुमसे कम ही मिल पाउंगा। ऐसा नहीं होगा। मैं तुम्हें कॉलेज छोड़ने आउंगा और लेने भी। और फिर हम साथ बैठकर खाना भी खाएंगे। नीलू दु:खी मन से राजीव की बात तो मान लेती है। लेकिन उसका दिल इसके लिए राज़ी नहीं होता।
 
   राजीव नीलू को आसमान में उड़ रहे पक्षी दिखाता है। और कहता कि नीलू तुम्हारे हौंसलों के पंखों की उड़ान बहुत मजबूत हैं। तुम आसमान में उड़ने के लिए पैदा हुई हो। तुम्हारी लगन और हिम्मत देखकर ही तो मैं भी कुछ करने की सोच पाता हूं।

   नीलू कहती हैं, राजीव चाहे कुछ भी हो जाए तुम मुझसे दूर नहीं जाना। वरना मैं...'मैं' नहीं रहूंगी। राजीव उसके सिर पर हाथ रखता हैं और कहता हैं नीलू चाहे आंधी आए या तूफान कोई भी मुझे तुमसे दूर नहीं कर सकता। अब आगे से कभी दूर होने जैसी बाते भूले से भी ना करना। नीलू गर्दन हिलाती हैं।


   धीरे—धीरे बारिश भी रुकने लगी थी। दोनों टू—व्हीलर पार्किंग की ओर चल पड़ते हैं। राजीव के पास एक पुरानी सी साइकिल थी। जिसे देखकर कई बार कॉलेज के दोस्त मज़ाक भी बना दिया करते थे। लेकिन नीलू उसके साथ थी। वो उसी साइकिल पर शान से बैठती।
     
      राजीव का हौंसला नीलू के साथ होने से बहुत बढ़ जाता। वो नीलू को बार—बार कहता कि देखना नीलू एक दिन हमारे पास शानदार गाड़ी होगी। तुम गाड़ी चलाना और मैं तुम्हारे बगल वाली सीट पर बैठूंगा। दोनों एक—दूसरे की हिम्मत बढ़ाते हैं। दोनों के बीच ऐसी कोई बात नहीं थी जो  छुपी हो। 
 
   लेकिन हालातों के आगे दोनों ही बेबस थे। कर्ज़ लेकर भविष्य संवारने की पीड़ा इन दोनों से ज़्यादा कोई नहीं समझ सकता था। राजीव दिनभर टाईपिस्ट की नौकरी करता और रात को पढ़ाई ताकि नीलू की पढ़ाई पूरी हो सके। नीलू भी अब खूब मन लगाकर एमबीए की पढ़ाई पर ध्यान देने लगी थी।

    दोनों अपने—अपने काम में व्यस्त होने लगे। अब मुलाकातें भी कम होने लगी। कभी—कभार मिलना होता तो दोनों के बीच खूब बातें हुआ करती। नीलू अपने कॉलेज के पीजी में ही रहती थी इसीलिए राजीव यहां लैंडलाइन पर फोन करके भी नीलू से बातें कर लेता। लेकिन नीलू के पास राजीव का कोई फोन नंबर नहीं था।
   
    वक़्त जैसे रेत की तरह फिसल रहा था। देखते ही देखते दो साल बित गए। नीलू का भी फाइनल ईयर था। पिछले पंद्रह दिनों से राजीव नीलू से मिलने नहीं आया। नीलू को फिक्र हो रही थी। ऐसा पहली बार हुआ कि राजीव ना तो नीलू से मिलने आया और ना ही उसका फोन। अगले महीने कैंपस प्लेसमेंट होना था। और वो राजीव की राह देख रही थी। उसे बैचेनी होने लगी थी।

   जब कई दिन और बित गए तब वह मजबूर होकर राजीव से मिलने के लिए उसके दोस्त के घर पहुंची। जहां पर राजीव रहता था। लेकिन दोस्त ने बताया कि राजीव बहुत बीमार था। उसे टाइफाइड हुआ था। उसके पिताजी और बड़ा भाई आए थे उसे लेने के लिए। वो उसे अपने साथ गांव लेकर गए है।
 
  नीलू को ये सुनकर बेहद धक्का लगा। वह रोते हुए कॉलेज पहुंची। उसके पास ना तो राजीव के गांव का पता था और ना ही कोई फोन नंबर। वह बहुत परेशान होती है। इधर, कैंपस प्लेसमेंट के लिए सिर्फ दो ही दिन बचे थे। जिस दिन के लिए राजीव और नीलू बेसब्री से इंतजार कर रहे थे आज वो दिन उनके दरवाज़े पर दस्तक दे रहा था लेकिन राजीव इस वक़्त उसके साथ नहीं है।
 
   कैंपस प्लेसमेंट में नीलू को बहुत बड़े पैकेज के साथ दिल्ली की एक मल्टीनेशनल कंपनी जॉब आफर करती है। नीलू बेहद खुश होती है। उसके हाथ में जॉइनिंग लेटर है। लेकिन उसकी आंखों में राजीव का बेसब्र इंतजार है। उधर कंपनी से लगातार जॉइनिंग के लिए नीलू के पास फोन आ रहे थे।

   कई दिनों तक राह देखने के बाद वो दिल्ली जाने का फैसला करती हैं। पीजी छोड़ने से पहले वो एक चिट्ठी राजीव के नाम छोड़ जाती है। जिसमें कंपनी का नाम, पता और फोन नंबर होता है। समय तो अपनी गति से ही बढ़ रहा था लेकिन नीलू आज भी उसी राह पर खड़ी थी जहां पर राजीव के इंतजार की लंबी घड़ियां हैं।

   पांच साल बित गए लेकिन राजीव की कोई ख़बर नीलू को नहीं मिली। नीलू के पास गाड़ी, बंगला, रुपया, बड़ी नौकरी सबकुछ हैं लेकिन नहीं हैं तो बस राजीव और उसका प्यार। नीलू हर सप्ताह अपने उसी पीजी में फोन करके राजीव के आने के बारे में पूछती रहती। उसे हर बार ना ही जवाब मिलता। लेकिन उसका दिल ये मानने को तैयार ही नहीं होता कि राजीव ने उसे कोई धोखा दिया है।

    आज जब मूसलाधार बारिश हुई तो उसका गुज़रा हुआ वक़्त उसकी आंखों में आंसू बनकर बह चला। लेकिन आज उसके आंसूओें में राजीव की याद का सैलाब उमड़ रहा था। वह ख़ुद को रोक नहीं पाई और उसी शहर में राजीव को ढुंढने का फैसला करती हैं जहां पर उन दोनों का साथ था।

   अगले दिन वो ट्रेन से रवाना होती हैं और उसी पीजी में अपना सामान रखकर राजीव के दोस्त के घर पहुंचती है। दोस्त की हालत भी पहले से काफी बेहतर थी। उसकी भी नौकरी लग गई थी। और लैंडलाइन फोन भी।
 
दोस्त नीलू को देखकर चौंक जाता हैं। नीलू राजीव के बारे में पूछती हैं लेकिन वह ये कहकर टाल देता है कि उसे उसके बारे में ज्य़ादा कुछ पता नहीं है। लेकिन वो उसे उसके भाई के पास लेकर जाता हैं जो इसी शहर में मजदूरी का काम करता है।

  नीलू राजीव के बड़े भाई से मिलती हैं। आज उसके भीतर बहुत हिम्मत थी। लेकिन एक वक़्त में जब राजीव और वो दोनों इसी शहर में संघर्ष कर रहे थे तब उसमें ये साहस नहीं था। वह उसके भाई से राजीव के बारे में पूछती हैं। वह उसे बताता हैं कि राजीव तो गांव हैं और तुम्हारी ही राह देख रहा है।

  ये सुनकर नीलू की आंखों से आंसू निकल पड़ते हैं लेकिन उसे इस बात पर बहुत गुस्सा भी आता है। वह पूछती हैं आख़िर पांच सालों तक वह मुझसे क्यूं नहीं मिलने आया? राजीव का भाई उससे कहता हैं इसका जवाब तुम ख़ुद ही उससे पूछना।

   नीलू और राजीव का भाई दोनों गांव के लिए निकलते हैं। रास्ते भर नीलू की धड़कनें तेज रही। कभी वह सोचती कि राजीव से वह बात ही नहीं करेंगी...फिर सोचती कि उसे एक थप्पड़ लगाएगी...फिर सोचती कि नहीं उसके गले से लगकर खूब रोएगी...। राजीव का भाई नीलू के चेहरे को बार—बार देखता और उसके भीतर चल रहे अंतरद्वंद को महसूस करता। लेकिन कहता कुछ नहीं। 

   जैसे ही गांव पहुंचते हैं नीलू के अंदर खुशी का उन्माद मचलता हैं। वह राजीव के घर पहुंचती है। ख़ुद को रोक नहीं पाती और जोरों से आवाज़े लगाने लगती है। राजीव...कहां हो...देखो..मैं नीलू...कहां हो जल्दी बाहर आओ...। लेकिन राजीव नहीं आता। राजीव का भाई उसे भीतर लेकर जाता है। एक पलंग पर राजीव के बीमार पिता सोए हुए है। वहीं उसकी बूढ़ी मां चूल्हें पर खाना बना रही है।

नीलू घर में चारोें तरफ देेखती हैं। तभी उसकी नज़र राजीव की साइकिल पर पड़ती है। वह तेज कदमों के साथ साइकिल के पास पहुंचती है। उसका भाई पीछे से कहता हैं...मिल लो राजीव से।


 नीलू समझ नहीं पाती। वह पूछती हैं राजीव कहां है। तभी राजीव की 'मां' उसके पास आती हैं और उसे ख़त  पकड़ाकर उसके सिर पर हाथ रखकर चली जाती है।
 नीलू का दिल जोरों से घबराने लगता है। वह ख़त  खोलती है। 
   जिसमें लिखा हैं।

      ' मेरी नीलू। मैं जानता हूं कि तुम मुझे एक दिन ढुंढते हुए यहां ज़रुर आओगी। मैं तुमसे माफी मांगता हूं कि तुमसे मिल न सका। लेकिन मैं मजबूर था। बीमारी की हालत में मुझे होश नहीं था। जब भैया और पिताजी मुझे अपने साथ गांव ले आए तो सोचा कि ठीक होकर जल्द ही तुम्हारे पास लौट आउंगा। लेकिन मेरी ​तबीयत बहुत बिगड़ चुकी है। टाइफाइड के बाद लिवर ख़राब हो चुका हैं। इतना पैसा नहीं कि आगे इलाज करा सकूं।
        डॉक्टरों ने भी अब जवाब दे दिया है। मैं कभी भी दुनिया छोड़कर जा सकता हूं। ये पत्र तुम्हारे नाम छोड़े जा रहा हूं। तुम अपने सपने ज़रुर पूरे करना।  मैं अपने परिवार की जिम्मेदारी भी तुम्हें सौंप रहा हूं। जब तुम पैसे वाली बन जाओ तब इनकी गरीबी को भी दूर कर देना। मैं समझूंगा मैंने अपना कर्तव्य पूरा किया है' ......।

     

 नीलू तुम्हारे लिए अपनी साइकिल छोड़ रहा हूं। इसे मेरा प्यार और साथ समझकर अपने पास रख लेना। एक बात और तुम कभी हिम्मत मत हारना। क्यूंकि तुम्हें कभी टूटते हुए देखूंगा तो मेरी आत्मा कभी खुश नहीं रहेगी।
      राजीव की चिट्ठी पढ़कर नीलू नि:शब्द हैं। आज उसका सबकुछ ख़त्म हो गया। दोनों ने न जानें कितने ही सपने देेखें थे। अनगिनत संघर्षो के बाद जब खुशी के पल आए तब राजीव ही नहीं रहा। अब नीलू इन सुखों को कैसे जीती। राजीव के लिए उसका प्यार ही सबकुछ था।

   वह राजीव की साइकिल से लिपटकर फूट—फूटकर रोती है। राजीव की तलाश तो आज पूरी हुई। लेकिन 
उसका जीवन राजीव के बगैर हमेशा के लिए अधूरा रह गया...।

 वह साइकिल को अपने साथ ले आती हैं। और उसी को राजीव का साथ मानकर पूरी उम्र गुज़ार देती है।  राजीव के परिवार की जिम्मेदारी उठाकर नीलू राजीव के  आख़री वादे को भी निभाती है।

....................


कहानी में 'आख़री' शब्द का उपयोग स्थानीय बोलचाल के तौर पर किया है। इसका अर्थ भी 'आख़िरी' शब्द ही है। 

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Dilkhush Bairagi

2 years ago

वाह मजा आ गया
पुरानी यादें ताजाहोगई

Vaidehi-वैदेही

2 years ago

Nice story

Teena Sharma 'Madhvi'

2 years ago

Thank-you 🙏

Teena Sharma 'Madhvi'

2 years ago

Thank-you 🙏

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1 year ago

बढ़िया

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