कबिलाई— एक 'प्रेम' कथा

    जोरों की बारिश आज मानो शंकरी के जी को जला रही थी...कहने को मौसम सुहाना हो गया था लेकिन भीतर की आग ने शंकरी को सोहन की याद में बिल्कुल जला डाला था...। बिस्तर पर औंधे मुंह पड़ी शंकरी कभी बारिश को कोसती तो कभी ख़ुद के हाल पर तरस खाती...। 


टीना शर्मा 'माधवी'

वह बार—बार टेंट से बाहर जाती और बारिश की बूंदों को अपनी ह​थेलियों पर लेकर मुट्ठी को कसकर बांध लेती...। एक पल के लिए वह सोहन को नजदीक महसूस करती...तो दूजे ही पल अपनी मुट्ठी खोल उसे अपने से बेहद दूर पाती...। 

    आज पूरे नौ बरस हो गए शंकरी को अपने सोहन से बिछड़े हुए...। उस दिन भी ऐसी ही तेज बारिश हो रही थी...। घना जंगल...और चारों तरफ घोर अंधेरा...। इसी बीच एक भटका हुआ मुसाफ़िर अपनी पंक्चर हुई चार पहिया गाड़ी के पास किसी की मदद मिल जाने की राह तक रहा था...। चेहरे पर तनाव और डर की लकीरें थी..। धीरे—धीरे रात गहरा रही थी...शीशे चढ़ाकर वह गाड़ी में ही बैठा रहा...। इस मौसम में दूर—दूर तलक उसे मदद मिल पाने की गुंजाइश न रही..। तभी उसे एक मोटर साइकिल नज़र आई...। 

           उसने गाड़ी से बाहर निकलकर हाथ हिलाया और उन्हें रुकने को कहा ....। उसे देख मोटर साइकिल रुक गई। मोटर साइकिल पर दो लोग सवार थे, वे दोनों नीचे उतरे और मुसाफ़िर से पूछा...कहो इस जंगल मोड़ पर इतनी रात कैसे...? उसने बताया कि वो किसी काम के सिलसिले में बांसवाड़ा गया हुआ था...शॉर्टकट लेने के चक्कर में वो इस जंगल रास्ते पर भटक गया...। उसने उन दोनों से पूछा—क्या आपके पास मोबाइल हैं...?   

  मुसाफ़िर की बात सुन दोनों मोटर साइकिल वालों ने एक—दूसरे को देखा और उसे ना कह दिया...। लेकिन दोनों ने मुसाफिर की मदद करने के लिए मन बनाया। 

    एक ने कहा— बाबूजी इत्ती रात को गाड़ी ठीक करने वाला नहीं मिलेगा आपको...। 

    तभी दूजे ने कहा— हमारी बस्ती यहां से डेढ़ किमी ही दूर हैं...। आज रात बस्ती में ही गुज़ार लो...। 

   तभी पहला बोल पड़ा— बाबूजी जहां पर आप खड़े हैं यहीं से जंगल इलाका शुरु होता हैं...आपका रात भर गाड़ी में बैठे रहना सुरक्षित नहीं होगा ...। हमारे साथ चलिए सुबह होते ही निकल जाना...। 

       मुसाफ़िर मन ही मन सोचने लगा...क्या करूं..? इनके साथ जाउं या नहीं...। ये लोग सही हैं या नहीं...? वह ख़ुद से बातें कर ही रहा था तभी वो दोनों बोल पड़े, बाबूजी इत्ता क्या सोच रहे हो...। चलो हमारे साथ....बारिश बढ़ती ही जा रही हैं...। 

    मुसाफ़िर ने मन ही मन फैसला किया इनके साथ जाने में ही भलाई हैं...। यदि वह इनके सा​थ नहीं गया तो न जानें रात भर में क्या होगा...? ऐसे वक़्त वह अपना मोबाइल ख़राब होने से भी बहुत दु:खी था....। 

   लेकिन इन हालातों में दूजा कोई विकल्प भी तो नहीं था सो  वह उन दोनों के साथ चल पड़ता हैं...। थोड़ी ही देर में वो लोग बस्ती पहुंच जाते हैं...। बस्ती पहुंचते ही मुसाफ़िर चौंक जाता हैं...। उसे हैरानी होती हैं...यहां पर एक भी घर नहीं हैं, बल्कि तंबू बनें हुए थे...। वो उन दोनों से पूछता हैं ये कैसी बस्ती हैं...? 

     वे दोनों उसे एक तंबू के भीतर ले आते हैं और उसे बताते हैं हम 'कबिलाई' हैं...हमारे 'घर' ये तंबू ही हैं...। जब तक यहां पर दाना—पानी मिलता रहेगा तब तक ठीक हैं, फिर दूसरे ठिकाने की तलाश में यहां से चल पड़ेंगे...। 

    अपने बारे में बताने के बाद वे उससे पूछते हैं...तुम कौन हो और क्या करते हो...? 

   वह कहता हैं मेरा नाम सोहन हैं...। मैं पेशे से एक इंजीनियर हूं...लोगों के घर बनाता हूं..। वे दोनों कबिलाई हंस पड़ते हैं...हां..हां..हां..हां....और सोहन से कहते हैं फिर तो सोहन बाबू आप हमारे काम के नहीं हो...क्यूंकि हमें तो पक्का घर बनवाना ही नहीं हैं...। उनकी बातें सुनकर सोहन भी जोरों से हंस पड़ा...। 

     तभी तंबू में सुंदर से नैन, नक्श वाली लड़की आई ...। उसके एक हाथ में लालटेन है और दूजे में पानी की मटकी...। सोहन उसे देखते ही रह गया...। सोहन को वह किसी फिल्म की हीरोइन की तरह लगी ...। लेकिन उसने फोरन अपनी नज़र उस पर से हटा ली...ताकि उसे एक अजनभी के सामने असहज ना लगे...।  

     उसने लालटेन जलाया और अपने पिता से बोली, ये कौन है...शहरी लगता हैं...। सोहन अपने बारे में उसे ख़ुद ही बताना चाहता था इसीलिए पिता के बोलने से पहले वह ख़ुद ही बोल पड़ा में सोहन हूं...इस तूफान में फंस गया था...ये दोनों ही मुझे यहां अपने साथ लेकर आए हैं...ये मदद नहीं करते तो शायद....। 

     अरे..अरे...बाबूजी बस...बस...। एक ही सांस में सब कुछ बोल पड़े...जरा सांस तो लो...। उसकी बात सुनकर सोहन शरमा गया और फिर थोड़ी झिझक के साथ उसका नाम भी पूछ लिया...तुम्हारा क्या नाम हैं...? 

     तभी दोनों कबिलाईयों में से एक ने बड़ी ही रौबदार आवाज़ के साथ बताया 'ये मेरी बेटी हैं, 'शंकरी'...। हम कबिलाईयों की जान और वन देवी का वरदान'....। 

    पिता की बात पूरी होने पर शंकरी बोली— ये मेरे पिता भीखू हैं जो पूरे कबिले के सरदार हैं..। 

   ये सुनकर सोहन समझ गया कि वो आज एक कबिले में हैं...उसने कबिलाई संस्कृति के बारे में थोड़ा बहुत सुन रखा था...इनके अपने नियम, अपने रीति—रिवाज होते हैं...ये अपनी बातों के बड़े पक्के होते हैं...। इसीलिए उसने इस वक़्त आगे कुछ और न पूछने में ही बेहतरी समझी...। 

   भीखू सरदार ने सोहन को कहा कि रात बहुत हो गई हैं फिलहाल तुम्हें खाने को तो कुछ नहीं मिल पाएगा...हां पानी की प्यास लगे तो ये मटकी यहीं रखी हैं...अब हम चलते हैं...। 

    तभी सोहन ने सरदार से पूछा कि, यहां पर किसी के पास कोई मोबाइल या टेलीफोन हैं क्या...? मेरी मां चिंता कर रही होगी...मुझे उनसे बात करनी हैं...। भीखू सरदार ने उसे बताया कि हम शहरी जीवन से जुड़े हुए ऐसे सभी सुख संसाधनों से दूर हैं...। कल सुबह तक इंतज़ार करो....जंगल के नाके पर एक सरकारी टेलीफोन हैं...वहीं से अपनी मां से बात कर लेना...। सोहन अब क्या करता, ठीक हैं कहकर रह गया।       

      शंकरी भीतर ही भीतर सोहन की परेशानी को महसूस कर रही थी...। लेकिन अपने पिता भीखू के सामने वह सोहन को ज्यादा दिलासा भी नहीं दे सकती थी...। ऐसा करना कबिलाई संस्कति के ख़िलाफ था...। बस वह सोहन से ये कहते हुए निकल जाती हैं, 'बाबूजी आराम से सो जाओ...कोई बात हो या कुछ चाहिए तो पिताजी का तंबू सामने ही लगा हुआ हैं...आवाज़ लगा देना'...। 

      शंकरी की बात सुन सोहन ने अपनी गर्दन हिला दी...।  और इस भयानक तूफानी रात के गुज़रने का इंतजार करने लगा....। सोहन तंबू में बैठा रहा...उसने एक पल के लिए भी नींद नहीं ली...। उसे अपनी मां की चिंता सता रही थी....मां इंतज़ार कर रही होगी...मैं घर क्यूं नहीं पहुंचा अब तक... कहीं​ किसी मुसीबत में तो नहीं...न जानें क्या—क्या सोच रही होगी।

     यही सारी बातें सोहन के दिमाग में चल रही थी...। तभी उसे अपने तंबू के बाहर धीमें—धीमें स्वर में कोई आवाज़ आई...। उसने बाहर जाकर देखा तो शंकरी थी...। उसने सोहन के हाथ में मोबाइल थमाया और बोली जल्दी से अपनी मां से बात कर लो...ये मोबाइल मेरी सहेली का हैं...इसके बारे में कबिलें में किसी को कोई ख़बर नहीं हैं...। तुम फोरन बात करो और मुझे मोबाइल वापस दे दो...। 

   शंकरी की बात सुनकर सोहन हैरान हो गया लेकिन समझदारी दिखाते हुए उसने बिना कोई सवाल किए शंकरी से मोबाइल लिया और अपनी मां को फोन किया...। मां ने फोन रिसीव किया तब सोहन ने जल्दी—जल्दी में बताया 'मैं ठीक हूं मां...तू चिंता मत करना'...मैं कल सुबह घर के लिए निकलूंगा...। 

     सोहन की आवाज़ सुनते ही मां ने गहरी सांस ली और बोली, ठीक हैं सोहन बेटा...तू अपना ख़्याल रखना...। तू अभी कहां हैं...मगर मां को आगे सुनने से पहले ही सोहन ने फोन कट कर दिया...। वो शंकरी के चेहरे पर डर को महसूस कर रहा था....। इसीलिए दो टूक बात कर उसने फोरन शंकरी को मोबाइल दे दिया...। 

    सोहन ने शंकरी को धन्यवाद कहते हुए उसके हाथ में मोबाइल दे दिया। शंकरी ने सोहन को पूछा क्या अब तुम बेफिक्र होकर नींद निकाल पाओगें...? 

     सोहन हंस पड़ा और बोला...तुम्हारी वजह से मैं अपनी मां से बात कर पाया हूं...निश्चित ही अब मैं बेफि​क्र हुआ हूं...अब सच में मुझे नींद आ जाएगी...। 

    सोहन की बात सुनते ही शंकरी ने कहा, अच्छा तो ठीक हैं अब मैं चलती हूं...और वह उसके तंबू से बाहर निकल जाती हैं। तभी सरदार के छोटे भाई ने उसे देख लिया...। शंकरी बुरी तरह से कांप गई...वो इसका अंजाम जानती थी...लेकिन सोहन नहीं...। 

         सरदार के छोटे भाई ने तेज बारिश और तूफान के बीच जोरों से सरदार भीखू को आवाज़ लगाई....शोर मचाकर पूरे कबिले को जगा दिया....

  'होओ...होओ...होओ...होओ'...। ये सुनते ही सारे लोग अपने—अपने तंबू से बाहर निकल आए...। सरदार भीखू ने अपने भाई से पूछा, ऐसी क्या बात हो गई जो इतनी रात को शोर मचा सभी को इकट्ठा किया...?

   तभी सरदार का भाई शंकरी की ओर हाथ करके बोला—पूछो अपनी बेटी शंकरी से...। शहरी बाबू के तंबू में ये इतनी रात गए क्या करने आई थी...। क्या इसे हमारे कबिले के नियम कायदे नहीं मालूम...?

सिद्धी शर्मा

ये सुनते ही भीखू सरदार चौंक गया और अपनी बेटी शंकरी को देखते ही ताव खाया...। उसने शंकरी के पास जाकर उससे पूछा बता क्यूं आई थी शहरी बाबू के पास....? तभी सोहन बीच में बोल पड़ा, इसका जवाब शंकरी नहीं मैं देता हूं....ये सुनते ही शंकरी घबरा गई और उसने फोरन सोहन को चुप रहने को कहा...। 

    वह भीखू सरदार के सामने नीचे गर्दन करके खड़ी हो गई और बोली, मुझे शहरी बाबू पसंद हैं....इसीलिए मैं इसे देखने चली आई थी...। 

     सोहन ये सुनकर आश्चर्यचकित हो उठा...उसे समझ नहीं आया आखिर शंकरी झूठ क्यूं बोल रही हैं...। तभी शंकरी, सोहन के पास जाकर खड़ी हो गई और उससे बोली...बाबू जी मैं यही बताने के लिए आपके पास आई थी ना...? बता दो इन सभी को....।

   सोहन बुरी तरह सकपका गया.... तेज बारिश में बस्ती के बीचों—बीच कबिलाईयों ने सोहन और शंकरी को खड़ा कर रखा था....सबकी आंखों में बेहद गुस्सा था...इस स्थिति को भांपते हुए उसे शंकरी की बात पर हामी भरना ही सही लगा...और उसने कह दिया...हां...हां...शंकरी मुझे यही बताने के लिए आई थी..।

ये सुनते ही भीखू सरदार बेहद खुश हो गया...उसने सोहन से आगे कुछ नहीं पूछा और हौ हुक्का...हौ हुक्का...बोलने लगा। सरदार के साथ—साथ पूरा कबिला हौ हुक्का...हौ हुक्का...हौ हुक्का के नारे लगाने लगा....। 

      सरदार ने सबको शांत किया और सुबह टिबड्डे पर इकट्ठा होने को कहा....। तभी सरदार के छोटे भाई ने उससे पूछा तो क्या कल ही शंकरी का ब्याह सोहन से होगा....?

सरदार ने जोरों से कहा— हां...हां...कल ही होगा। 

         ये सुनते ही सोहन के होश उड़ गए...। वह बुरी तरह से घबरा गया...वह सरदार से पूछने ही वाला था तभी शंकरी ने उसका हाथ दबा दिया....और धीमें स्वर में बोली, क्यूं जान गवाना चाहते हो...ये लोग तुम्हें मार देंगे....। अभी चुप रहो बाबू....। 

      शंकरी की बात सुनते ही सोहन चुप तो हो गया लेकिन अब उसकी नींद पूरी तरह से उड़ चुकी थी...। अगले दिन सुबह कबिले के लोग बस्ती के टिबड्डे पर जमा हुए....। 

    शेष अगले भाग में पढ़े.....

'धागा—बटन'...

तबड़क...तबड़क...तबड़क...

कभी 'फुर्सत' मिलें तो...

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