‘चरण सिंह पथिक’

by teenasharma
चरणसिंह पथिक

 ‘कहानी का कोना’ में आज पढ़िए लेखक ‘चरण सिंह पथिक’ की कहानी ‘कलुआ’..। लेखक ‘चरणसिंह पथिक’ उन चुनिंदा कथाकारों में शामिल हैं जिनकी कहानियों में ग्रामीण परिवेश की अलग—अलग झ​लकियां दिखाई देती हैं..। पथिक की कहानी  ‘दो बहनें’ शीर्षक पर पटकथा लेखक व निर्देशक विशाल भारद्वाज ने ‘पटाखा’ और ‘कसाई’ शीर्षक कहानी पर गजेंद्र एस.श्रोत्रिय ने इसी नाम से ​फिल्म बनाई हैं। लेखक के कई कहानी संग्रह हैं जिनमें पीपल के फूल, बात यह नहीं हैं, गोरु का लैपटॉप और गार्की की भैंस शामिल हैं। इन्हें रांगेय राघव, अनुराग साहित्य, पंडित चंद्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ कथा आदि कई सम्मान प्राप्त हो चुके हैं…।

 

‘कलुआ’

भैंस दर्द के कारण खंड के चारों ओर चक्कर काट रही थी। कभी बैठ जाती। तो कभी खड़ी होकर फिर चक्कर लगाती। दर्द की हिलोर पेट से उठती और पिछले हिस्से से टकराकर लौट जाती। जीभ बार-बार बाहर निकलती फिर बार-बार अंदर जाती। दर्द से निजात पाने का ये उसका अपना तरीका था। कलावती बैठी हुई एक टक भैंस के पिछवाड़े पर नजर रखे हुए थी। वह इंतजार में थी कि कब भैंस ठीक से स्थिर होकर खड़ी रहे या बैठ जाए जिससे वह नवजात को ठीक से खींचकर बाहर निकालकर भैंस को दर्द से, छुटकारा दिला सके।

                    जानवरों के ब्याने (प्रसव) के मामले में पहला अनुभव वह खुद ही प्राप्त करना चाहती थी। वरना ज्यों ही नवजात के सिर और अगले पैर बाहर निकलते दिखते तो उसे खींचकर बाहर निकालने के सिद्धहस्त बहुत सारे थे उसके मुहल्ले में। वैसे तो वह अपने मुहल्ले के अलावा गाँव की कई औरतों को जापा करवा चुकी थी।

वह एक सिद्धहस्त दाई थी। उसके हाथ के हुनर के सभी कायल हैं। किसी को प्रसव होना होता तो बड़ी बूढ़ी यही कहतीं कि कलावती से बढिय़ा कोई दाई नहीं है। उसने भी कभी किसी को टाला नहीं। कोई भी मौसम हो, कोई भी वक्त हो, वह एक आवाज़ में साथ हो लेती। रंग में जितनी काली थी, उतनी ही जुबान की उजली और तेज़ थी कलावती।

अमूमन उससे टकराने की कोई हिमाकत करता ही नहीं था। अगर टकरा भी जाता तो वह अपनी तेज़ और खरी जुबान के ऐसे करतब दिखाती कि सामने वाला खिसकने में ही अपनी भलाई समझता।

चरणसिंह पथिक

  चरणसिंह पथिक

पचास घर के कोलीपाड़े में कुछ लोग दिल्ली, रतलाम, नागपुर के रेलवे स्टेशनों पर कुली का काम करते थे। कुछ मकानों के कारीगर थे मुश्किल से दो-तीन लोग ही सरकारी नौकरी में थे। गाँव के पूर्वी छोर पर बसा यह मुहल्ला आए दिन उफनता रहता। कलावती का कुनबा भरा-पूरा था।

मगर ये कुनबा दुनिया को बाहर से देखने और कहने के लिए ही भरा-पूरा था। वरना कलावती की अपनी दुनिया तो अपने कबीर पंथी पति के घर छोडऩे के साथ ही उजाड़ और खंडहर हो चुकी थी। शादी के शुरूआती वर्षों में तो उसने अपने पति को अपनी देह की साँवली और चमकदार भूल-भुलैया में भटकाए रखा था। लेकिन वह एक रात गया तो फिर कभी लौटकर नहीं आया।

बोलने में इतनी तेज और खरी कि कब क्या बक दे, कोई पता जी। सामने वाला बात कहीं से शुरू   करता और कलावती उसी बात को इतने मोड़ों पर ले जाती कि भटकने वाला भटककर रह जाता। जब खत्म करती तो कबीर की एक-दो साखी ऊपर से और सुनाकर उसका दम खुश्क कर देती।

इसलिए उसका संवाद भी अपने ही मुहल्ले में बहुत कम हो पाता। पहले एक बकरी थी उसके पास! उससे बातें करती। अब भैंस है, पहली बार ब्याएगी। कलावती परेशान है। भैंस अभी खूंटे के चारों ओर चक्कर लगाने से बाज नहीं आ रही है।

वह खीझकर भैंस को सुनाकर कहती, ‘अब दर्द हो रहा है तो जीभ निकाल रही है और जब उचंग छूटी थी तो ख़ुद ही खूँटा तुड़ाकर भैंसा के दौड़कर गई थी। अब भुगतना तो तुझे ही होगा। तेरी जगह मैं जणूं का…?

वह अक्सर ऐसे ही संवाद करती। देवर, जेठ, देवरानी, जेठानी न बोलें तो न सही। उसे लडऩा हो तो भैंस है अपनी। पहले वह ऐसे ही बकरी से लड़ती। वह जब किसी का जापा करवाने जाती तो ऐसे ही जापे वाली को गरियाती। कोई उसका बरा भी नहीं मानता। जापे वाली प्रसव में होने वाले दर्द से बिलबिलाती तो वह उसे झिड़ककर कहती, ‘हाँ…हाँ, और जोर लगा थोड़ा।

बच्चादानी खुल रही है।
प्रसव वेदना से जलती औरत बोलने में असमर्थ जब हाथ से इशारा कर बताती कि वह अब इससे ज्यादा ज़ोर नहीं लगा सकती तो कलावती सारे दर्द को सोखकर हँसकर कहती, ‘उस वक्त तो खूब जोर लगाया होगा…! तब नहीं साचा कि आगे क्या होगा? अब करती है बकरी की तरह म्यं..म्यं। वह ऐसे ही खुली भाषा में बातें कर साथ बैठी एक-दो बड़ी-बूढिय़ों को हुंकारा देने को मजबूर कर दर्द को हवा में उड़ा देती।

सहवास के ऐसे-ऐसे काल्पनिक और वास्तविक किस्से सुनाती कि जापे वाली नवोढ़ा के दर्द भरे चेहरे पर मुस्कान तैरने लगती। फिर वह अपने सधे हाथों का कमाल दिखाकर सकुशल जापा करवाती। दो-तीन दिन तक जच्चा-बच्चा के पोतड़े धोती और भी इस एवज में मिलता, उसे माथे से लगाकर ले जाती। कभी किसी से झंझट नहीं। जगी के दिनों में आधी-आधी रात तक कबीर की साखी गाकर सबको जगाए रखती।

ऐसी बात भी नहीं है कि प्रसव की अनगढ़ पीड़ा से कभी कलावती का साबका की ही न पड़ा हो। जिस वक्त उसका पति मांग्या उसे छोड़कर गया था, उस वक्त उसके पेट में छह महीने का भूण था ऐसा भी नहीं था कि मांग्या ने पहली बार घर छोड़ा हो। इससे पहले भी वह बाबा किशनदास के साथ कबीर के पद, साखी और उलटबांसियां गाते हुए कभी महीना, कभी छह महीना के लिए गायब हो जाता था।

घर रहता तो वह शाम के वक्त कलावती को भी साथ-साथ गाने के लिए मजबूर कर देता। कलावती सुर साधकर मांग्या का भरपूर साथ देती। लेकिन घर छोडऩे की आशंका से ही उसका बदन झनझना उठता था। वह रात के एकांत में मांग्या से घर न छोडऩे का पुराने जमाने की तर्ज पर कौल-करार करा लेती।

कुल तीन भाइयों में मांग्या मंझला था। कलावती की साँवली देह और उसकी लच्छेदार रसभरी बातें मांग्या को बाँधे रखतीं। खेती के नाम पर कुल दो बीघा जमीन। खाने के लिए अनाज की पूर्ति नहीं हो पाती थी। उससे बड़ा और छोटा रतलाम और नागपुर के रेलवे स्टेशनों पर कुली का काम करते। कलावती और मांग्या मजदूरी करके घर का अपना ख़र्च चला लेते।

कलावती की इच्छा थी कि मांग्या अगर नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर कुली हो जाए तो आमदनी का स्थायी जरिया बन सकता है। मगर कुली का महँगा होता नंबर उसे चाँद-तारों जैसा लगता। छोटे-बड़े ने जब नंबर खऱीदा था तो बहुत सस्ता था। आज मांग्या नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर कुली होने के लिए चार-पाँच लाख रुपये कहाँ से लाए? बेचने के लिए न जेवर न खेत… ।

वो कौन-सी मजबूरी थी जिसके तहत मांग्या ने घर छोड़ा…? कलावती आज तक इस बात को समझ नहीं पाई। वह रात के एकांत में खूब सोचती मगर कोई राह न सूझना। मांग्या के घर छोडऩे के तीन महीने बाद प्रसव की जिस अपार वेदना से वह गुजरी थी, उसमें उसकी जान मुश्किल से बच पाई थी। मगर वह अपने नवजात को नहीं बचा सकी। तीन महीने बाद होने वाले नवजात का मोह भी मांग्या को रोक नहीं पाया था।

आज अगर उसका बेटा जीवित होता तो गबरू जवान होता। जिस अनकही और अनगढ़ पीड़ा से वह गुजऱी थी, अब उसकी कल्पना कर सिहर उठती है। और इसी सिहरन ने उसे तेज़ छुरी जैसी जुबान देकर बानी का जीवन बचा लिया था।

जेठ और देवर दोनों की नजर उसके शरीर पर रहती। दो-तीन महीने वे अपनी-अपनी जगहों पर कुलीगिरी करते। जो कमा कर लाते, उसे गाँव आकर दारू-मीट में उड़ा देते। एक-दो महीना रुककर फिर काम पर चले जाते। जब घर होते तो शाम को नशे में धुत्त दोनों ही उसकी फिराक में रहते। मगर कलावती हाथ नहीं रखने देती। वह दिनभर साँझे में उनके कबीला के लिए खटती रहती।

ज्यों-ज्यों शाम होती, वह दरकने लगती। हद तो यह थी कि उसकी बूढ़ी सास भी उसे दोनों में से किसी एक की चादर ओढऩे को कहती,’अकेली औरत कब तक करवट बदलेगी कलावती…  घूडिय़ा तेरा देवर ठहरा। उसी को कर ले….
‘ मैं कोई विधवा नहीं हूँ। ख़सम ने घर छोड़ा है, देह नहीं। कभी तो आएगा निपूता…। कलावती बूढ़ी सास को बरजकर कहती। बूढ़ी सास फिर आगे नहीं कह पाती।

एक रात दोनों भाइयों ने मिलकर उसे दबोचना चाहा तो वह कुल्हाड़ी उठाकर बिफर पड़ी, ‘आज के बाद फिर ऐसी हरकत मत करना, वरना दोनों के बुरका-बुरका करके नाले में डाल दूंगी। उसने गुस्से में काँपते हुए पूरी ताक़त से कुल्हाड़ी का भरपूर वार घर के किवाड़ पर किया। बाएँ पाँव की भरपूर लात मारी। किवाड़ रात के सन्नाटे को चीरता हुआ भरभराकर गिरपड़ा। उसने एक पाँव गिरे हुए किवाड़ पर जमाकर कहा, ‘आज के बाद मेरे हिस्से के घर में किवाड़ भी नहीं लगेगा। जिसकी माई ने दूध पिलाया हो वो आए मेरे पास…। 

बाहर जगार हो चुकी थी। सर्दियों की वह धुंध भरी रात थी। उसी के मुहल्ले के उसी के कुनबे के लोग उसे हैरत से देखे जा रहे थे। औरतें खुसर-फुसर में मशगूल दोनों भाइयों को लानत भेज रही थीं। उसकी देवरानी और जेठानी अपने पतियों की करतूत और कलावती के कारनामे पर जलभुन रही थीं। उस रात सुबह तक जो बितंडा हुआ, उसे कलावती आज तक नहीं भूल पाई। उसकी देवरानी ने उस रात जो ताना मारा, वह आज तक उसके गले में फाँस बनकर अटका हुआ है। उसने कहा था , ‘तुझ जैसी काली, कलूटी को कौन मर्द सूंघेगा…?

ऐसी ही है तो काहे भगाया अपने मर्द को…! सिंगार-पटार तो ऐसे करती रहती है जैसे किसी को खा जाएगी। ऊपर से नखरे करती है छिनाल! देवरानी के कुबोलों ने उसे झिंझोड़कर रख दिया था। जी मैं तो आया था की कुल्हाड़ी की एक ही वार से उसकी गर्दन अलग कर दे, मगर वह यह सोचकर थम गई कि अभी वह वक्त नहीं आया है।

इसके बाद उसका अलग द्वार, अपना खाना और अपना सोना-जागना। किवाड़ अब भी उसकी दो ‘घह कि पाटौर में नहीं है। कुछ मजदूरी और कुछ दाई का काम। वह अपने अकेले पेट लायक कमा ही लेती। सास को मरे हुए अब बरसों हो चुके हैं। ससुर की उसने आज तक सूरत नहीं देखी। सुना था उसने भी बहुत पहले ही घर छोड़ दिया था। मांग्या ने शायद परंपरा निभाई है।
अतीत याद आता तो उसकी आंखें झरने लगतीं। वह चुपचाप लूगड़ी के पल्लू से आंखों के कोर पहुंच डालती।

भैंस बैठ चुकी थी। वह मुंह फाड़े जोर-जोर से सांसें ले रही थी। कलावती की सतर्क निगाहें उसके पिछवाड़े पर जमी हुई थीं उसने देखा कि पानी की एक थैली सबसे पहले बाहर निकली। वह तैयार थी। दर्द की हिलोरे लगातार भैंस के पिछवाड़े से टकरा रही थीं। वह बेचैनी से पहलू बदलती हुई अचानक खड़ी हो गई। कलावती भी खड़ी होकर भैंस के पीछे आ गई। कुछ मिनटों बाद नवजात का सिर और अगले पैर नजर आए।

कलावती ने आदतन कहा, ‘जोर लगाकर कलकत्ती। भैंस का नाम भी उसने कलकत्ती रख छोड़ा था। कलावती ने फुर्ती से अपनी हथेलियों में राख मलकर नवजात के चिकने और लिसलिसे अगले पैर मजबूती से पकड़कर फिर कहा, ‘ शाबाश कलकत्ती! थोड़ा और जोर लगा। बस्स हुआ ही समझो। नवजात एक मिनट से भी कम समय में कलावती के मजबूत और सधे हाथों में होता हुआ फिसलकर जमीन पर आया। आदत के अनुसार कलावती ने नवाजत के ऊपर लिथड़ी चिकनी महीन झिल्ली अपने हाथ से सूँतकर अलग की। उसके पिछवाड़े हाथ फेरकर देखा और किलक उठी।

‘पाड़ा…! वह पहले से ही तैयार गुनगुना पानी झट से दौड़कर ले आई। बड़ी हसरत से पाढ़े को नहलाया। फिर अचानक जैसे कुछ याद आया। वह लपकर घर से अंदर से थाली लाई। शाम के धुँधलके में पूरा मुहल्ला झनझना उठा। थाली की गूंज उसकी देवरानी और जेठानी के कानों से होती हुई उनके दिल में गूंजकर खटकने लगी। मुहल्ले के बच्चे कौतुक से उसके छोटे से बाड़े में इक_े हो चुके थे। कोई चाची तो कोई ताई कहकर बार-बार पूछता, ‘क्या डाला?
कलावती पुलकर जोर से अपने कुटुंबियों को सुनाकर कहती, ‘कलुआ

उसकी देवरानी गुस्से में भरभुट होकर अपने आंगन में बड़बड़ाई, ‘रांड को इतना ही कलुआ जनने का शौक था तो खसम कर लेती। अब बोलती है भेलड़ा-कौ-भेलड़ा। भैंस की तरह उठी-उठी…।

लेकिन कलावती तो अपने कलुआ में मगन थी। मुहल्ले के बच्चों को भैंस के वास्ते लाया गुड़ बांट चुकी थी। कलावती सोचती-जमाने की उलटी रीत। भैंस अगर पाढ़ा देती है तो धणी का मुंह उतर जाता है। गाय और औरत का तो एक जैसा हाल है। अजीब दुनिया है।
वह कलुआ पर प्यार से हाथ फेरती रही। उसे चटाती रही। उसे पता है, अभी तो बहुत मेहनत बाकी है। कलकत्ती को अपनी झेर डालना है। कौओं और कुत्तों से कलुआ की नाल और उसके पैरों के नरम नीले-नीले खुरों को बचाना है।

जापे की जटीलता और व्यस्तता को वह बखूबी जानती-समझती है। जापे वाली चाहे भैंस हो या औरत। उसने एक बाल्टी में भैंस का कीला (सद्य: प्रसूता भैंस या गाय का दूध) काढ़ा और कलुआ को कौली में भरकर जैसे-तैसे खड़ा करके भैंस का थन उसके मुंह में दे दिया। कलुआ के लिए उसने बेटे की तरह मनौती मांगी थी। वह उसे बेटे की तरह ही खिला-पिलाकर बड़ा करेगी। कुछ भी हो जाए, कसाइयों के हाथ में नहीं देगी।

उसे याद आया जब वह ‘उठी हुई कलकत्ती को लेकर गांव के मुहल्ले-मुहल्ले परेशान डोलती रही थी। गांव में एक भी सार्वजनिक पाढ़ा नहीं था। कलकत्ती जोर-जोर से रेंकती और दौड़ती। लोग तीखा और कटु मजाक करते। उसे पहली बार ऐसा हुआ कि एक अकेली औरत का ‘उठी हुई भैंस को ‘बुआने ले जाने पर लोग कैसे-कैसे बेहूदे, गंदे और बेमतलब के सवाल पूछते हैं। दो-चार दबंगों के छोरों ने तो उसकी नाक में दम कर दिया था। ‘काहे कलावती! भैंस उठी है क्या…?
कलावती लाज से लबरेज होकर बस इतना ही कह सकी थी, ‘हां।

उनमें से एक ने अपने दूसरे साथी की तरफ इशारा कर कहा था, ‘इधर आ जा, ये ‘बू देगा।
कलावती जल्दी-जल्दी कलकत्ती की सांकल पकड़े जब आगे बढ़ी थी, तो उनमें से एक ने रास्ता रोककर कहा था, ‘ भैंस के संग-संग कभी तू नहीं ‘उठती क्या?

तब कलावती ये सोचकर कि कौन मुँह लगे, आगे बढ़ गई थी। अगर कोई और वक्त होता तो वह उनकी सब सांडगिरी भुला देती।
जब से गाँव में दो-तीन दबंगों ने पाढ़ा रखकर भैंस ‘बुआन का धंधा शुरू किया, तब से गाँव में कोई भी सार्वजनिक पाढ़ा नहीं टिक पाता। वे उस पाढ़े को मार-मारकर गाँव के बाहर खदेड़ देते। उनकी जमकर कमाई होती। एक बार बुआने के सौ रुपये लेते।
कलावती के लिए सौ रुपये ही पहाड़ जैसे हो गए थे तिस पर ये कि मेरे पाढ़े के पास लेकर चल वरना…? मगर कलावती सबको ठेंगा दिखाकर दूसरे गाँव जाकर ही वहाँ के सार्वजनिक पाढ़े से कलकत्ती को बुआ कर लाई थी। उसने उसी वक्त तय कर लिया था कि अगर उसकी कलकत्ती पाढ़ा डाल देगी, तो वह गरीब-गुरबों की भैंसों का जरूर ख्याल रखेगी। वह अपने कलुआ को सार्वजनिक पाढ़े के रूप में छोड़ देगी।

दिन गुजऱने के साथ-साथ कलुआ का काला रंग निखरने लगा। कलावती मन से उसे नहलाती। फिर सरसों का तेल लगाती। कलकत्ती का आधा दूध उसे चुखा देती। साल भर बाद कलुआ के पट्टे भरने लगे। माथे पर छोटी-छोटी सींगड़ी निकलने लगी। कलकत्ती फिर ‘उठी और कलावती ने दबंगों की लाख कोशिशों के बावजूद उनके पाढ़ों से कलकत्ती नहीं ‘बुआई।Ó वह अब भी दूसरे गाँव तीन कोस जाकर कलकत्ती को ‘बुआ कर लाई। कसाई अलग से आए दिन गाँव के हर मुहल्ले की हर गली में टेर लगाकर पूछते रहते, ‘कोई भैंस-पाढ़ा बिकाऊ है क्या…?

किसान अपनी उन बूढ़ी भैंसों को कसाइयों के हाथों बेच देते जिनकी भविष्य में ब्याने की उम्मीद टूट चुकी होती है। साथ में उन मरगिल्ले से पाढ़ों को भी बेच देते, जो साल-दो-साल में हजार-आठ सौ रुपये तक बिकने लायक हो जाते थे। कलुआ का काला-चमकीला रंग और पुष्ट को देख-टटोलकर वे कलावती से उसे बेचने का इसरार करते।
‘दो हजार देंगे। 
‘न भैया, बिलकुल नीं…
‘पाँच सौ और ले लेना माई।
‘पाँच लाख भी नीं…।
कलावती सारे रास्ते बंद कर टका-सा जवाब देती। वह मन-ही-मन या जी में आया तो खूब सुना-सुनाकर कहती, ‘बेटे की तरह पाला है कलुआ को…कसाइयों को कैसे बेच दूँ..दूध में गुड़ मिलाकर पिलाती हूँ।

तीन साल का होते होते कलुआ भैंस ‘बूने के काबिल हो चुका था उसकी छोटी-छोटी सींगड़ी माथे की ओर मुड़कर जलेबी की तरह चक्करदार होने लगी थी। काली चमड़ी ऐसे चमकती जैसे सांप की केंचुली हो। कलावती उसे अब भी रोज नहलाती, तेल चुपड़ती जिससे उसकी चमड़ी का रंग और भी काला होकर चमकने लगता।

थोड़ी देर अगर वह खुला रह जाता तो आस-पड़ोस की भैंसों को सूंघता फिरता। कलावती उसे ‘गांववाईÓ बनाने का पक्का इरादा कर चुकी थी। कलवा की कद काठी और पुष्ठता को देखकर हर कोई रश्क करता। कलावती तो रोज उसकी बेटे की तरह बलैया लेती।

एक दिन कलावती ने गांव के हर मुहल्ले में घूम-घूमकर गांव के मुख्य-मुख्य पंच पटेलों को गांव के बीच स्थित अस्थाई पर इक_ा किया। लोगों ने पूछा तो यह कहा, ‘मेरे घर का कोई मसला है।

पंचायत जुडऩे के नाम पर गांव में लोग खूब इक हो जाते हैं। अंथाई पर दबंगों और गांव की सभी जातियों के पंच पटेलों सहित लगभग पचास आदमी एकत्रित हो चुके थे। कलावती अंथाई से कुछ दूर बैठी हुई थी।

बद्री पटेल ने खड़े होकर कहा, ‘कलावती कोलिन ने पंचायत बुलाई है। मसला बताया नहीं। सरपंच मदन लाल खटीक भी यहीं मौजूद हैं। अच्छा हो, कलावती से मसला पूछकर पंचों के सामने रखें।

सरपंच मदनलाल एससी की आरक्षित सीट पर जीतकर सरपंच बना था। पैंतीस साला सरपंच पटेलों और दबंगों के बीच कबूतर-सा दुबका हुआ बैठा था, जैसे कोई बहुत सारी बिल्लियों के बीच बैठा हो।

वह अंथाई से उतरकर कलावती के पास आया। कलावती ने उसे धीमे-धीमे स्वर में बता दिया कि मैं कलुआ को गांव के सुपुर्द करना चाहती हूं।

सरपंच ने अंथाई पर जाकर सभी पंच पटेलों को कलावती का इरादा सुना कर कहा, ‘बहुत अच्छी बात है की कलावती गांव के लिए अपना पाढ़ा दे रही है- वो भी मुफ्त। गांव में एक पंचायती पाढ़े की कमी भी है। कलावती का पाढ़ा भी उम्दा नस्ल का है। मैंने उसे देख रखा है।

अंथाई और उसके आसपास अब तक सैकड़ों की संख्या में लोग एकत्रित हो चुके थे। बहुत सारे लोग धीमे-धीमे स्वर में एक-दूसरे से यह कहने में मशगूल थे की कलावती ने यह काम तो अच्छा किया है, वरना उसके जैसा पाढ़ा बीस हजार से कम में नहीं आता। लोगों को अब सुविधा भी होगी। गांव में इसकी कमी है ही, लेकिन फैसला तो गांव के चार-पांच मुख्य पटेलों के ऊपर निर्भर था।

उनके आगे क्या सरपंच और क्या ग्राम पंचायत की औकात। वे चाहें तो कलावती के पाढ़े को पढिय़ा सिद्ध कर दें। चाहें तो खस्सी सिद्ध कर दें। पांचों मुख्य पटेल दबंग जाति के ठहरे। ऐसी वैसी जातियों के पटेल तो बेचारे इनके पिछलग्गू बनकर हां में हां और ना में ना मिलाने को मजबूर होते हैं।

तीन पटेलों के अपने-अपने घरेलू पाढ़ा थे, जिनसे वे धंधा करके चार- पांच सौ रोज की कमाई कर लेते थे। मामला बड़ा पेचीदा होता जा रहा था। लोग आपस में कानाफूसी करने लगे। अगर कलावती का पाढ़ा गांववाई छूटता है तो तीनों पटेलों के पाढ़े खाली खड़े-खड़े अपने खूंटों पर पूछ हिलाएंगे। हो सकता है, कसाइयों को बेचने पड़ जाएं। कौन भैंस लेकर जाएगा कलुआ के रहते उनके पास…?

ज्यादातर लोग और सरपंच चाहते थे कि कलावती के पाढ़े का कान पांच आदमियों की उपस्थिति में थोड़ा सा काट काटकर यहीं गांववाई बना दिया जाए। मामला उलझता देखकर भारती पटेल ने कहा, ‘कलावती का पाड़ा अच्छा है, मगर इसमें एक पेंच है। उस पर भी गांव के पंच गौर कर लें।

लोग उत्सुकता से भरती के चेहरे की ओर ताक में लगे। भरती पटेल भी अपना घरेलू पाढ़ा रखे हुए थे। उसने बड़ी भद्र और नर्म आवाज में कहा, ‘ गांव में आज तक ऐसा नहीं हुआ कि कोई पाढ़ा या विजार कोली, चमार, खटीक आदि जातियों ने छोड़ा हो। मेरी तो सातों पीढ़ी पटेलाई करती हुई इसी गांव में मर-खप गई। हमने तो कभी बाप-दादों से सुना नहीं ऐसा…।

‘ हां, यह तो है। बात भी सही है। आस-पास के गांवों के लोग क्या सोचेंगे कि अमुक गांव में अब कोलियों का पढ़ा अच्छे-अच्छे दबंग पटेलों की भैंसों को ‘बू रहा है। बड़ा नीचा देखना पड़ जाएगा आस-पास के गांव की बिरादरी में। रामदयाल ने भर्ती का समर्थन किया।

लोगों में फिर खुसर पुसर होने लगी। कलावती ने तो सपने में भी ऐसी बातों को नहीं सोचा था। वह तो सभी दबंगों के यहां जापा करवाने जाती रही है। तब नहीं कहते ये पटेल कि हमारी जनानी की ‘उसको हाथ मत लगाना।

 उसने एक बच्चे के जरिए सरपंच को अपने पास बुला कर तीखे स्वर में कहा, ‘ आप गांव के सरपंच है। आप कुछ क्यों नहीं कहते जी…? पाढ़े में जाति कहां से खुसेड़ दी इन्होंने।
‘इनको कौन समझाए कलावती…?  सब अपने स्वार्थ में अंधे और बहरे हो चुके हैं।’ सरपंच ने लाचार और बेबस आवाज में अपनी मजबूरी बताई।

‘लेकिन इनसे इतना तो कह ही सकते हैं कि पाड़ा, पटेल और दूध की जात नहीं देखी जा सकती। कहते हुए कलावती का चेहरा तमतमा गया।
सरपंच थके कदमों से अंथाई पर आया। कहा, ‘कलावती ठीक कहती है।
‘क्या ठीक कहती है। एक साथ कई स्वर उभरे।
‘यही कि पाढ़ा, पटेल और दूध की जात नहीं देखी जाती।
‘यह कहावत अब पुरानी हो चुकी है। जमाना बदल गया है। राम ने प्रतिवाद किया।

‘ठीक है लेकिन इस बदले जमाने में जात-पात का किस्सा भी पुराना पड़कर पीछे छूट चुका है। सरपंच ने जवाब दिया।
‘अजी, सरकारी कागजों में जात-पात मिटने से ये मतलब तो नहीं कि हमारे यहाँ खत्म हो गई हो! सरकारी कागजों में तो न जाने क्या-क्या काला-पीला होता रहता है। भरती ने कड़ककर कहा।

बहस लंबी चले, इसके बजाय सरपंच चाहता था कि कलुआ के बारे में कुछ फैसला हो जाए। इसलिए उसने फिर अपनी तरफ से पंचायत में कोशिश की। ‘आप फिर सोच लें। आदमियों ने तो अपनी जात बता दी मगर जानवरों को तो जात-पात में मत बाँटो।
‘ये किस्सा ही ख़त्म करो भाई।

 भरती ने गुस्से में कहा, फिर कलावती को ज़हर-बुझी सांत्वना दी, ‘कलावती नेक दिल है। घर-घर जापा करवा चुकी है। हमने तब कहाँ इसकी जात देखी।

मगर ये मामला ऐसा है कि अगर कोई मुझसे ही पूछ बैठे कि कल कि मेरी भैंस कौन से पाढ़े से ‘बूई’ है? और मैं ये कहूँ अपने नाते-रिश्तेदारों या अपने बिरादर भाइयों से कि मेरी भैंस कोली वाले पाढ़े से ग्याभिन है तो मेरी तो भद्द कुट गई न…!

वैसे तुम सोचते होंगे कि हम जात-पात में विश्वास करते हैं? क़तई नहीं। यहाँ सरपंच बैठा है। इससे पूछ लो। हम इसे बराबर से अपनी चारपाई पर बैठाते हैं। लेकिन ये पाढ़े वाला मामला ही ऐसा है।

बाहर गाँव के लोग सोचेंगे कि अमुक गाँव के पंच-पटेल एक पाढ़ा गाँववाई तक नहीं ला सके। इसलिए एक कोलिन ने अपना पाढ़ा गाँव को दान दिया है। तो भैया, हम पंच-पटेलों की बेइज्जती तो होगी ही, साथ में गाँव का नाम भी बदनाम होगा। हमें तो सभी जगह पटेलाई करने जाना पड़ता है। यह सरपंच तो गाँव की हद तक ही ठहरा।

कलावती ने देखा-सभी लोग भरती पटेल की बातों से सहमत हैं। उसे कबीर के दोहे, साखी और उलटबांसियाँ याद आने लगे। मगर सुनाए किसे…? कौन सुनेगा…? उसने अपने बूते थके स्वर में जहाँ बैठी थी, वहीं से सबको सुनाकर कहा, ‘पंचों का फैसला पंचों के ही माथे…। कलुआ गाँववाई न सही लेकिन इस बस्ती की कोई भी भैंस हो या दूसरी बस्ती की भैंस…कलावती के कलुआ के पास ले आना, कलावती एक धेला भी नहीं लेगी।

उसने ये बात सबको जोर से सुनाकर कही। अंथाई पर बैठे पंच-पटेलों सहित आस-पास बैठे सभी लोगों ने सुना।
पंचायत लगभग बिखर चुकी थी। कलावती भी थके कदमों से अपने मुहल्ले की तरफ मुड़ चुकी थी। वह मन-ही-मन में बड़बड़ाई, ‘मैंने कलुआ को दूध, गुड़ और घी खिला-पिलाकर पूत-सा पाला है। आज वो कोली हो गया। तो भैंस ही तो ‘बूता।’ किसी की बहन-बेटी की इज्ज़त तो नहीं लेता।

कलावती की कही हुई बात सुनकर पंचायत बिखरते वक्त रामदयाल ने कुटिल मुस्कान के साथ जो कहा, वो शायद कलावती ने सुना हो या न सुना हो लेकिन और सभी ने सुना, ‘कलुआ गाँव में रहेगा तब न…?

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“बातशाला”

‘अपने—अपने अरण्य’

प्रेम का ‘वर्ग’ संघर्ष

‘फौजी बाबा’…

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2 comments

फूल - Kahani ka kona May 23, 2022 - 8:59 am

[…] 'चरण सिंह पथिक' […]

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נערת ליווי July 28, 2022 - 8:57 pm

Itís difficult to find well-informed people in this particular subject, but you sound like you know what youíre talking about! Thanks

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मैं अपने ब्लॉग kahani ka kona (human touch) पर आप सभी का स्वागत करती हूं। मेरी कहानियों को पढ़ने और उन्हें पसंद करने के लिए आप सभी का दिल से शुक्रिया अदा करती हूं। मैं मूल रुप से एक पत्रकार हूं और पिछले सत्रह सालों से सामाजिक मुद्दों को रिपोर्टिंग के जरिए अपनी लेखनी से उठाती रही हूं। इस दौरान मैंने महसूस किया कि पत्रकारिता की अपनी सीमा होती हैं कुछ ऐसे अनछूए पहलू भी होते हैं जिसे कई बार हम लिख नहीं सकते हैं।

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