‘टू मिनट नूडल्स’ नहीं हैं ‘नाटक’…

by Teena Sharma Madhvi

     आज ‘विश्व रंगमंच दिवस’ हैं। ‘कहानी का कोना’ में इस मौके पर प्रस्तुत हैं,  राजस्थान—रंगमंच की वरिष्ठ रंगकर्मी और नाट्य निर्देशक रुचि भार्गव से खास बातचीत—

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 एक ‘नाटक’ अहसासों से मिलकर बनता हैं। जिसमें पसीने की गंध भी होती हैं तो एक—दूसरे को छूकर अपने भावों को अभिव्यक्त करने की अनुभूति भी…।



   रुचि भार्गव कहती हैं कि रंगमंच कोई ‘टू मिनट नूडल्स’ नहीं हैं। ये एक ऐसी विधा हैं जिसकी पकाई ज़रुरी हैं। वरना दर्शकों को कच्चा ही खाने को मजबूर होना पड़ेगा। और इन दिनों नाटकों का यही हाल हो रहा हैं। 

    जैसे—तैसे प्रस्तुतियां हो रही हैं। ना ही ढंग के नाटक लिखे जा रहे हैं और ना ही उन्हें पूरे मन से निभाया जा रहा हैं। 

    वे कहती हैं कि आज ‘ओटीटी’ प्लेटफॉर्म का ज़माना हैं। इसे एक नए अवसर के रुप में देखना चाहिए। बशर्ते कि थिएटर करने वाले इसके साथ पूरी निष्ठा, लगन और ईमानदारी रखें। यदि वे बेहतर सीखने के बाद टीवी, सिनेमा या फिर कोई और प्लेटफॉर्म पर काम करते हैं तब ये वाकई  अच्छी बात हैं। 

   लेकिन रंगमंच पर आधा—अधूरा सीखकर वे यदि मुंबई की ओर रुख करते हैं तब ये ज़ोर आजमाईश बेकार हैं। क्योंकि बुरा काम करने वालों की इस इंडस्ट्री में भी जगह नहीं हैं। 

   ‘रंगमंच’ के दिनों—दिन गिर रहे स्तर पर रुचि कहती हैं कि ये कोई नई बात नहीं हैं। रंगमंच के जीवन में कभी अच्छा तो कभी बुरा दौर आता रहता हैं।  

    अपने अनुभव साझा करते हुए रुचि ने बताया कि वर्ष 1999 में जब उन्होंने रंगमंच की दुनिया में कदम रखा तब ये अपने अच्छे दौर में चल रहा था। 

     लेकिन जो लोग पहले से थिएटर कर रहे थे या कहूं कि थिएटर के दिग्गज कहलाते थे वे सत्तर के दशक को थिएटर का सुनहरा दौर मान रहे थे। उनके अनुसार इस वक़्त थिएटर अपने सुरुर पर था। वे लोग ऐसा इसलिए कह रहे थे क्योंकि इस वक़्त रंगमंच देखने बड़ी संख्या में दर्शक पहुंचते थे। नाटक देखने के लिए लंबी कतारें लगा करती थी। बकायदा टिकट बिका करते थे। 

   लेकिन टीवी आने के बाद थिएटर का स्वरुप बदलने लगा। थिएटर करने वालों को इसमें अपना भविष्य दिखने लगा और वे इसे कुछ हद तक जरिया समझने लगे। और फिर कुछ सालों तक धीरे—धीरे जयपुर रंगमंच का दौर कमज़ोर पड़ने लगा। 

   लेकिन ‘जयरंगम’ की शुरुआत होने से नाटककारों में फिर से उत्साह भर उठा। एक ही छत के नीचे रंगकर्मियों को कई नाटक करने को मिलनें लगे। लेकिन ये साल में एक ही बार होता हैं। और लोकल कलाकारों को कम मौका मिलने से यहां भी निरंतरता नहीं बनी रही। 

   इसी तरह के उतार—चढ़ाव के दौर से गुज़र रहा हैं ‘हिन्दी थिएटर’। रंगमंच की बेहतरी के लिए रुचि भार्गव एक अन्य बिंदु की ओर भी ध्यान आकर्षित करती हैंं। वे कहती हैं कि थिएटर को अलग—अलग जगहों पर ले जाने की ज़रुरत हैं। मोहल्लों में छोटे—छोटे ‘थिएटर हॉल’ बनने चाहिए। कई दर्शक थिएटर को बेहद पसंद करते हैं लेकिन थिएटर हॉल दूर होने से भी वे कई बार इससे वंचित रह जाते हैं। इसे सुलभ बनाने की आज बेहद ज़रुरत हैं। इससे एक नई किस्म की परंपरा शुरु होगी।  

   अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए रुचि ने अपनी थिएटर जर्नी को बेहद रोचक बताया। वे बताती हैं कि मैं एक ‘रुढ़िवादी’ परिवार से थी। ऐसे में रंगमंच करना बेहद दूर की बात थी। लेकिन मुझे डांस सीखने का अवसर मिला था। इसी के बाद थिएटर में आई हूं। तब मुझे थिएटर के बारे में बिल्कुल भी अनुभव नहीं था। धीरे—धीरे इसे समझने लगी तब दिमाग खुलने लगा और व्यक्तित्व में  बदलाव आने लगा। यही वक़्त था जब मैं थिएटर को जीने लगी थी। 

   रंगमंच ने मुझे अंदर तक झंकझौर दिया था। मुझे अहसास होने लगा कि ये विधा ‘दर्शक और कलाकार’ के बीच का एक सशक्त माध्यम हैं। यहां पर हाथों—हाथ दर्शक आपके काम को पसंद और नापसंद के तराजू में तोल देते हैं। यही वो माध्यम हैं जब आप दर्शकों से ‘एकाकार’ होते हैं…। 



   रुचि कहती हैं कि कोरोनाकाल की वजह से ‘डिजिटल थिएटर’ का कॉन्सेप्ट अधिक जागृत हो गया हैं लेकिन ये लंबे समय तक सुचारु रुप से नहीं चल सकता। क्योंकि ऑनलाइन में सिर्फ लाइक, कमेंट और व्यूज़ होते हैं जो ‘नाटक’ को जीवंत नहीं कर सकते। नाटक निर्जीव ही नज़र आता हैं। 

   रुचि इसके लिए एक बेहतरीन उदाहरण पेश करती हैं। वे कहती हैं कि आदमी छोटा—बड़ा, लंबा—नाटा व दुबला—पतला हो सकता हैं लेकिन वह कहलाएगा ‘आदमी’ ही…उसे ‘रोबोट’ नहीं कहां जा सकता हैं। यही अंतर हैं ‘डिजिटल थिएटर’ और ‘पारंपरिक रंगमंच’ में…। 

    वे कहती हैं कि ‘लकीर ना पीटें’..। रंगमंच की दुनिया से जुड़े लोग इस नाट्य कला को जीवंत रखने के लिए आगे आएं… अच्छे प्रोडक्शन तैयार करें…युवाओं की टीम बनाएं…उन्हें थिएटर की बारीकियों का प्रशिक्षण दें…..समय—समय पर ऐसी वर्कशॉप रखें जिसमें इस क्षेत्र के दिग्गजों को बुलाया जाए जो अपने अनुभवों से युवाओं में एक नई ऊर्जा भर सके।अच्छा काम होने पर दर्शक थिएटर तक ज़रुर पहुंचेंगे। 

वे पूरे आत्म विश्वास से कहती हैं कि चाहे जो भी हो लेकिन ‘रंगमंच’ कभी ‘मरेगा’ नहीं…।

‘नाटक’ जारी हैं…

नाटक को चाहिए ‘बाज़ार’…

रंगमंच की जान ‘गिव एंड टेक’…

जी ‘हुजूरी’ का रंगमंच…

‘ऑनलाइन प्रोडक्शन’ थिएटर की हत्या…


   




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1 comment

Anonymous August 11, 2021 - 4:04 am

Truely Said

Kumar Pawan

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मैं अपने ब्लॉग kahani ka kona (human touch) पर आप सभी का स्वागत करती हूं। मेरी कहानियों को पढ़ने और उन्हें पसंद करने के लिए आप सभी का दिल से शुक्रिया अदा करती हूं। मैं मूल रुप से एक पत्रकार हूं और पिछले सत्रह सालों से सामाजिक मुद्दों को रिपोर्टिंग के जरिए अपनी लेखनी से उठाती रही हूं। इस दौरान मैंने महसूस किया कि पत्रकारिता की अपनी सीमा होती हैं कुछ ऐसे अनछूए पहलू भी होते हैं जिसे कई बार हम लिख नहीं सकते हैं।

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