'नाटक' को चाहिए 'बाज़ार'...

       'रंगमंच' की दुनिया में आज ख़ुद का प्रमोशन अधिक होने लगा हैं। रंगमंच करने वाला ख़ुद को 'प्रोडक्ट' मान बैठा हैं। जबकि असल प्रोडक्ट तो 'नाटक' हैं जिसकी मार्केटिंग होनी  चाहिए। ये कहना हैं वरिष्ठ रंगकर्मी और लेखक लविका माथुर का। 



'रंगमंच' को लेकर वे अपना नज़रियां स्पष्ट रखती हैं। उनका मानना हैं कि वर्तमान हालात बहुत बुरे हो गए हैं। आज जो लोग नाटक कर रहे हैं या करवाते हैं वे सिर्फ इस बात से इत्तेफ़ाक रखने लगे हैं कि सिर्फ वे ही लोगों के सामने प्रस्तुत हो। लोगों की वाहवाही सिर्फ उन्हीं को मिलें। उनकी पूरी शक्ति ख़ुद पर ही केंद्रित होकर रह गई हैं। जबकि रंगमंच की जान तो 'नाटक' है जिसे बेहद सुंदर और सशक्त रुप से लिखने और उसे निभाने की ज़रुरत हैं। वास्तविकता में तो इसका प्रचार होना चाहिए। बकायदा नाटकों पर टिकट लगना चाहिए। जिसे ख़रीदकर लोग देखने आए। और ये तभी संभव हैं जब रंगमंच का स्वरुप 'कमर्शियल' हो। 

 यहां पर वे सवाल रखती हैं कि फिल्में देखने के लिए भी टिकट ख़रीदा जाता हैं फिर रंगमंच के लिए क्यूं नहीं...?  

   वे अपनी बात को मराठी, बंगाली और गुजराती थिएटर के साथ जोड़ते हुए कहती हैं कि आज भी ये थिएटर बेहद दमदार त़रीके से चल रहे हैं। ये पूरी तरह से कमर्शियल थिएटर की दौड़ में अव्वल हैं। फिर हिन्दी थिएटर की ये दुर्गती क्यूं..? इसकी वज़ह का एक पहलू लविका ख़ुद बताती हैं। वे कहती हैं कि मैं पंद्रह साल मुंबई में रही। इस दौरान कई नाटक किए। जिसकी एवज में बकायदा 'साइनिंग अमाउंट' मिलता था। लोग हज़ार रुपयों के टिकट खरीदकर नाटक देखने आते थे। कितना ही बड़ा अभिनेता हो या फिर छोटा सभी को थिएटर की दुनिया में एक समान देखा जाता था। 

   आज मुझे लगता हैं कि थिएटर को ज़िंदा रखने के लिए वाकई कमर्शियल होने की बेहद ज़रुरत हैं।  

    लविका से जब पूछा कि आपकी 'थिएटर जर्नी' कब से शुरु हुई। तब वे हंसकर कहती हैं कि ​मैं तो 'थिएटर को समझने से पहले ही थिएटर' करने लगी थी। ये वो वक़्त था जब वीसीआर हुआ करता था और मैंने इसी माध्यम पर कई पाकिस्तानी नाटक देखें।

   मेरे पिताजी एयरफोर्स में थे। उनके अकसर अलग—अलग जगहों पर ट्रांसफर होते थे। ऐसे में हम जहां भी रहे वहां पर एक अलग ही सोसाइटी में रहने का मौका मिला। जब भी कोई उत्सव होता जैसे कि गणेश उत्सव, दुर्गा पूजा, फागोत्सव या फिर दिवाली मिलन समारोह होता था तब मैं पाकिस्तानी नाटक किया करती थी। लेकिन प्रॉपर थिएटर मैंने जयपुर में आकर किया। बतौर थिएटर कहूं तो 'हाय मेरा दिल' मेरा पहला नाटक था। इसी के बाद मेरी असल थिएटर जर्नी शुरु हुई थी। इस दौरान मैंने बहुत कुछ सीखा। लिखना, पढ़ना और भाषा का ज्ञान मुझे थिएटर की वज़ह से मिला। 

   लविका अच्छी कविताएं भी लिखती हैं। जिसे नाटकों में भी इस्तेमाल किया गया हैं। लविका कहती है कि अभी ऐसा लगता हैं मानो थिएटर की दुनिया में क्रिएटिविटी का जैसे अकाल पड़ गया हो। 


    ना लोग कॉस्ट्यूम डिजाइन पर काम करते हैं ना ही सेट्स व बाकी चीज़ों पर। जो मिल गया उसी में कर देते हैं नाटक। नाटक करने का ये तरीका सही नहीं हैं। 

    आज का युवा तो तकनीकी रुप से बेहद दक्ष हैं। ऐसे में क्या वो थिएटर को आधुनिकता के साथ अपडेट नहीं कर सकते। क्यूं हर बार लिखे लिखाए नाटकों का मंचन होता हैं..क्या नए नाटक, नए तरीके इज़ाद नहीं हो सकते..? जो दर्शकों की रुचि और परिस्थितियों के अनुसार हो। 

    वे कहती है कि अभी दर्शक ग़ायब हैं। इसकी वज़ह हैं 'नाटक और पैसा'। जिसके बीच में भटक रहा हैं उद्देश्य...। 

    निश्चित ही नाटक करके पैसा कमाया जा सकता हैं। लेकिन उसके लिए नाटक को भी बाज़ार के तौर पर प्रस्तुत करना होगा। रंगमंच के लिए भी अच्छी वैकेंसी निकाली जानी चाहिए। जिसमें सेट डिजाइनर, कॉस्ट्यूम डिजाइनर, मेकअप आर्टिस्ट और बैकस्टेज हेल्पर समेत जो भी थिएटर को कमर्शिल बनाने के लिए ज़रुरी हो उन्हें नियुक्ति दी जाए। 

      थिएटर की मूल आत्मा न मरें लेकिन थिएटर सभी की पहुंच में हो। इसके लिए सभी को आगे आना होगा। सभी को अपनी—अपनी मटकी भरकर रखने की बजाए एक ऐसी नदी बनानी होगी जिसका पानी निर्झर बहता रहे। 

    वे अपनी इस बात को स्पष्ट करती हैं कि, सिर्फ ग्रांट लेकर अपनी जेबे न भरी जाए। जो पैसा सरकार से मिलता हैं उसे अभिनेताओं को भी दिया जाए। जिससे थिएटर के प्रति उनका आकर्षण व उत्साह बना रहे। 

    मुझे दु:ख होता है ​जब कुछ कुछ 'बड़े लोग' आसानी से कह देते हैं कि थिएटर कमाई का साधन नहीं हैं...। मैं मानती हूं कि इसे कमाई का ज़रिया बनाया जा सकता हैं बशर्ते कि इसे 'मैं' के प्रस्तुतिकरण से बाहर निकाला जाए। 

     रैंप मॅाडलिंग और टीवी करने के बाद भी लविका को थिएटर में अधिक सुख लगता हैं। वे कहती हैं कि मैं आख़िरी वक़्त तक थिएटर करना चाहूंगी। 

    युवाओं से कहूंगी कि वे धैर्यता, निष्ठा व पूरी ईमानदारी के साथ थिएटर करें। इसे सिनेमा मैं काम करने का महज़ ज़रिया न समझे। 'अध—कचरा' कहीं भी काम नहीं आता...। 


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Unknown

1 year ago

सिर्फ़ नाटक कर लेना ही रंगकर्म नहीं है बल्कि रंगमंच के लिए आपके लिखे इन सटीक ब्लॉग्स का लेखन भी रंगमंच के लिए बड़ा योगदान है।
आपके इस प्रयास के लिए धन्यवाद्।

Teena Sharma 'Madhvi'

1 year ago

धन्यवाद सर।

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