बजता रहे 'भोंपू'....

     कोरोना संक्रमण की गति कम होने से देश अब फिर काम पर लौट रहा हैं निश्चित ही ये एक 'शुभ' संकेत हैं। लेकिन इसके बावजूद लोगों में 'कोरोना गाइडलाइन' को लेकर कोई गंभीरता नज़र नहीं आ रही हैं। इसकी बानगी बाज़ारों में उमड़ रही भीड़ में देखी जा सकती हैं।

    हमें ये कतई नहीं भूलना चाहिए कि पहली लहर के कमजोर पड़ने के बाद भी यहीं हुआ था। जिसके गंभीर परिणाम हमनें दूसरी लहर के रुप में देखे थे और अभी तक उसे देख रहे हैं। किस तरह एक झटके में ही लाखों जिंदगियों को 'लील' गया ये 'कोरोना'। ताजा आंकड़ों पर गौर करें तो देश में कोरोना वायरस से अब तक 3 लाख 90 हजार 691 कुल मौतें हो चुकी हैं। वहीं प्रदेश में 8 हजार 904 और राजधानी जयपुर में 1 हजार 967 मौतें।

       
 अपनों के मर जाने का दर्द क्या होता हैं ये उनसे ही पूछिए जिनके आंसू अभी तक सूखे नहीं हैं...। इसके बाद भी हम लोग वहीं गलती दोहरा रहे हैं। आखिर इतनी बड़ी भूल करने के लिए हम तैयार कैसे हो गए हैं...? जबकि कोरोना जैसा राक्षस अब भी मुंह फाड़े हुए बाहर खड़ा हैं। कब समझेंगे हम इत्ती सी बात...? आखिर कब...? ये सवाल अब भी शेष ही हैं।


       सरकार की ओर से लॉकडाउन में छूट मिलते ही जिस रफ्तार से लोग बाजारों की तरफ दौड़ रहे हैं वो बेहद चिंतनीय हैं। वो भी ऐसे समय पर जबकि तीसरी लहर की आशंका पैदा हो रही हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस लहर के बारे में पहले ही चेता दिया हैं। लेकिन ये लहर कब आएगी, कितने समय के लिए आएगी इसके बारे में पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता हैं। ऐसे में सड़कों और बाजारों में बेवजह घूमने की यह प्रवृत्ति ना सिर्फ खुद के लिए बल्कि दूसरों के लिए भी बेहद खतरनाक साबित हो सकती हैं।

        अभी हाल ही में 21 जून को पूरे विश्व में 'योग दिवस' मनाया गया। इस दिन लोग अपने घरों में अपने परिवार व दोस्तों के साथ अलग—अलग योगासन करते हुए ख़ुद को स्वस्थ्य रखने का खुद से वादा करते नजर आए, तो चंद लोग अब भी 'हठ योग' ही कर रहे हैं जो न सिर्फ ख़ुद के लिए बल्कि अपनों की सुरक्षा पर भी भारी हैं। इसे क्या कहें 'लापरवाही' या जान बूझकर किया जाने वाला 'अपराध' जो इस महामारी के वक्त देशद्रोह से कम नहीं हैं।  

     माना कि देश में कोरोना संक्रमण धीरे—धीरे कम होता जा रहा हैं और जागरुक लोग वैक्सीन भी लगवा रहे हैं लेकिन इनके बीच लापरवाही का ग्राफ भी तो बढ़ रहा हैं। जिस पर समय रहते नकेल कसना बेहद ज़रुरी हैं।

      और ये नकेल सरकार को समय रहते ही कसनी होगी।और ऐसा सरकार को करना भी चाहिए। क्यूंकि अब ना ही बंगाल में चुनाव कराने की मजबूरी हैं और ना ही कुंभ। यहींं बात राज्य सरकारों पर भी लागू होती हैं। इन सरकारों को भी पूरी तरह केंद्र पर निर्भर रहने की भूल नहीं दोहरानी चाहिए। अपने इंतजामातों को पुख़्ता करने पर जोर देना चाहिए।

     

फिलहाल इस नाजुक वक़्त में दोनों सरकारों को एक 'देसी सुझाव' भेंट है, जो वर्तमान हालातों के बीच कारगर साबित हो सकता हैं और वो हैं हमारा देसी 'भोंपू'...।
     गांव—गली—मोहल्लों और चौराहों पर ये मुनादी करा दी जाए कि अब से तीनों प्रहर ये 'भोंपू बजता ही रहेगा'। ये भोंपू ठीक वैसे ही काम करेगा जैसे कि रात को चौकसी पर खड़ा गार्ड करता हैं, 'जागते रहो...जागते रहो'...।


     एक ऐतिहासिक तथ्य पर नज़र डालें तब प्राचीन काल में आम आदमी तक अपनी बात पहुंचाने और महत्वपूर्ण सूचनाएं भेजने के लिए नगाड़े के अलावा भोंपू का ही सबसे अधिक प्रयोग होता था। बल्कि मुगलकाल में तो महत्वपूर्ण घोषणाएं व संदेश पहुंचाने के लिए अलग से 'नक्कारची' होता था जो खुले बाज़ारों में नगाड़ा पीटते हुए फरमान की घोषण करता था। जिससे सभी लोगों का ध्यान उस ओर लग जाए। मुगल दरबार में तो बकायदा एक 'नक्कारखाना' भी होता था जिसमें अहम सरकारी फैसले सुनाए जाते थे।
     

 वर्तमान सरकारों को भी इसका प्रयोग करना चाहिए। इसे लागू कर देने से सबसे अधिक फायदा ख़ुद सरकार का ही होगा। एक तो इसकी पालना कराने के लिए सरकार को ना तो सख्ती दिखानी होगी और ना ही करोड़ों रुपए ख़र्च करने होंगे। ।
      
       इसे लागू करने के लिए दो उपायों पर विचार किया जा सकता हैं, पहला ये कि भोंपू बजाने के लिए कुछ आदमियों को लगाया जाए जो ये बोलते रहे, 'बिना बात घर से बाहर न निकलें, कोरोना अभी गया नहीं हैं'...सजग रहे...सतर्क रहें...मास्क ज़रुर पहनें...दो गज दूरी हैं ज़रुरी....वगैरह...वगैरह...।

      दूसरा उपाय हैं ऑडियो कैसेट। इसे भी तैयार करके रिकॉर्डेड बजाया जा सकता हैं। गाड़ी में स्थायी रुप से इसे सेट कर दिया जाए और वो बजता रहेगा...'सजग रहे..सतर्क रहें'...।

      भारतीय संस्कृति और रहन—सहन के लिहाज़ से लोगों को कोरोना महामारी से सजग करने का फिलहाल ये सटिक रामबाण उपाय हैं। बाकी सरकार की अपनी कितनी तैयारी हैं ये तो व्यवस्थाएं ही बताएंगी।

      सबसे बड़ी और अहम बात ये भी हैं कि जागरुकता के साथ—साथ 'मुफ्त टीकाकरण अभियान' भी पूरी तरह से सफल हो। इस अभियान को भी देसी सुझाव यानि 'भोंपू' पर प्रचार—प्रसारित किया जा सकता हैं। हाल ही रिपोर्ट बताती हैं कि देश में अब तक 28 करोड़ 87 लाख से अधिक लोगों का टीकाकरण हो चुका हैं। ये सराहनीय हैं।


   ऐसे में सौ फीसदी लक्ष्य हासिल करने में भोंपू की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती हैं। दिन भर यदि ये भोंपू लोगों के कानों में पड़ता रहा तो निश्चित ही कहीं न कहीं वे लापरवाही करते—करते ख़ुद को रोक लेंगे या लापरवाही करेंगे ही नहीं। क्योंकि हम चीजों को जानते तो हैं लेकिन सहजता से उसे मानते नहीं हैं। ये 'भोंपू' आम आदमी को मानने के लिए प्रेरित अवश्य ही करेगा।
        इससे पहले भी हम सभी इस बात को जानते आए हैं कि कचरा इधर—उधर नहीं फेंकना हैं फिर भी उसे कहीं पर भी फेंकने की गलती दोहराते रहे हैं। अब डंडा करके वहीं बात सरकार ने सिखाई हैं तो इसे मान रहे हैं। बल्कि अब तो शहरों के बीच 'क्ल्निेस्ट सिटी' का अवॉर्ड पाने की भी होड़ भी लगी हुई हैं। रामचरित मानस के द्वारा तुलसीदास ने ये सच ही कहा हैं 'भय बिनु होइ न प्रीति'...।
         फिर ये तो महज़ एक आलाप हैं जो आमजन को जागरुक ही करेगा वो भी बिना किसी डंडे के...।

       इस समय भारत में कोरोना वायरस के अलग—अलग वेरिएंट आ चुके हैं। जो अलग—अलग राज्यों में अलग—अलग जगहों पर संक्रमण फैला रहे हैं। अब तक कोरोना वायरस के अलग—अलग अवतार आ चुके हैं। इससे पहले तक भारत में कोरोना का यूके वेरिएंट, ब्राजील वेरिएंट, दक्षिण अफ्रीका वेरिएंट और अमेरिका का एक वेरिएंट था।

      ऐसे में एक बात तो अब हरेक व्यक्ति को समझ लेनी चाहिए कि पहले से ज्यादा सावधानी बरतनी हैं। मास्क तो बिल्कुल भी नहीं हटाना चाहिए। सैनेटाइजर के उपयोग के साथ साथ साबुन से हाथ धोना और एक दूसरेे से दो गज की दूरी बनाने के नियम को तो अब जीवन का नियम बना लेना चाहिए।

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मंत्री शांति धारीवाल

5 months ago

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