धूल से उठकर सफेद जर्सी तक का सफर

क्रिकेटर: मानव सुथार

by teenasharma
धूल से उठकर सफेद जर्सी तक का सफर

धूल से उठकर सफेद जर्सी तक का सफर

 ये कहानी है उस युवा क्रिकेटर की जिसे बचपन में सिर्फ ताने ही मिले। लेकिन उसने उन तानों के पंख बना लिए और ऐसी उड़ान भरी जिसे आज पूरी दुनिया देख रही हैं। धूल से उठकर सफेद जर्सी तक का सफर..। मानव सुथार..।

   यदि आप ये सोच रहे हैं कि आप छोटे कस्बे या गांव ढाणी में रहते हैं, तो बड़ा सपना पूरा नहीं कर सकते हैं..। तो एक बार ये कहानी ज़रुर पढ़िए। एक ऐसी कहानी जो आपको बड़े सपने दिखाएगी भी और उसे पूरा करने के लिए हौसला भी देगी। ये कहानी है उस युवा क्रिकेटर की जिसे बचपन में सिर्फ ताने ही मिले। लेकिन उसने उन तानों के पंख बना लिए और ऐसी उड़ान भरी जिसे आज पूरी दुनिया देख रही हैं।
मानव सुथार..।

राजस्थान के अन्न भंडार कहे जाने वाले श्रीगंगानगर के एक छोट से गांव से हैं। आज भी जब यहां शाम ढलती है, तो गांव की चौपाल पर लोग किस्से सुनाते हैं, संघर्ष के, मेहनत के और उन सपनों के, जो खेतों की मेड़ों से निकलकर आसमान छू लेते हैं।
ऐसी ही एक कहानी है राजस्थान की इस माटी में पले बड़े मानव सुथार की। जिसने छोटे से गांव की गलियों से निकलकर भारतीय टेस्ट टीम तक का सफर तय किया।  

धूल से उठकर सफेद जर्सी तक का सफर

क्रिकेटर मानव सुथार

3 अगस्त 2002 को मानव का जन्म एक सामान्य परिवार में हुआ। पिता जगदीश सुथार सरकारी शिक्षक हैं। और मां सुशीला देवी एक हाउस वाइफ। मानव के दिल में बचपन से ही एक सपना पल रहा था, ”क्रिकेट खेलना हैं..।”

इंडियन टीम में खेलेंगे

लेकिन मानव जब बैट-बॉल लेकर निकलते तो लोग उनका मज़ाक बनाते। ताने मारते। ‘क्रिकेट खेलकर कौन-सा बड़ा खिलाड़ी बन जाएगा?’ मानव के दिल में ये ताने इतनी गहराई से बैठ गए, उन्होंने ठान लिया वे एक दिन इंडियन टीम में खेलेंगे।
और उनके इस सपने को पूरा करने में उनका साथ दिया उनके पिता ने। हालांकि शुरुआत में पिता चाहते थे कि बेटा बल्लेबाज बने। हर पिता की तरह उनकी भी चाहत थी कि बेटा चौके-छक्के लगाए। लेकिन अकादमी के कोच की नजर में मानव की प्रतिभा कुछ और ही थी। उन्हें मानव के हाथों में एक ऐसी फिरकी दिखाई दी, जो बड़े-बड़े बल्लेबाजों को उलझा सकती थी।

बस फिर क्या था…

मानव ने गेंद को ही अपना हथियार बना लिया। सुबह की ठंडी हवाओं में अभ्यास, तपती दोपहर में पसीना और शाम तक मैदान पर जमकर मेहनत।यही उसकी दिनचर्या बन गई।
धीरे-धीरे गांव का ये लड़का अंडर-14 और अंडर-16 क्रिकेट में चमकने लगा। कप्तानी मिली, टीम को जीत मिली और लोगों की सोच भी बदलने लगी। जो लोग कभी ताने देते थे, अब वही शाबाशी दे रहे हैं।
इसके बाद साल 2022 में आया वो दिन जब मानव को राजस्थान की रणजी टीम से खेलने का मौका मिला। यह सिर्फ चयन नहीं था, बल्कि उस परिवार की बरसों की मेहनत का पहला बड़ा इनाम था।

सपनों को मिलें पंख

इसके बाद मानव ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उसकी गेंदों की फिरकी बल्लेबाजों के लिए एक पहेली बनने लगी। विकेट गिरते गए और उसके सपनों को नए पंख मिलते गए। इंडिया-ए, इमर्जिंग एशिया कप और रेस्ट ऑफ इंडिया जैसी बड़ी टीमों में जगह मिलने लगी।
इसके बाद 2023 का वनडे वर्ल्ड कप..। मानव को भारतीय टीम का नेट गेंदबाज बनाया गया।

अब गांव की पगडंडियों पर खेलने वाला मानव अब दुनिया के सबसे बड़े खिलाड़ियों के सामने गेंदबाजी कर रहा था। और फिर वह पल आया, जिसका इंतजार सिर्फ मानव नहीं, पूरा राजस्थान कर रहा था। मानव का अफगानिस्तान के खिलाफ भारतीय टेस्ट टीम में चयन होना। करीब 12 साल बाद राजस्थान का कोई खिलाड़ी टेस्ट टीम में पहुंचा हैं।

छोटे गांवों में भी जन्म लेते हैं सपने

इसीलिए मत भूलिए, सपने छोटे गांवों में भी जन्म लेते हैं..। बस उन्हें पूरा करने का हौंसला और कड़ी मेहनत चाहिए। वास्तविकता में युवा खिलाड़ी मानव सुथार की कहानी सिर्फ क्रिकेट की कहानी नहीं है। यह उन लाखों युवाओं और प्रतिभाओं के लिए एक प्रेरणा हैं जो अपने सपनों को बीच रास्ते में ही छोड़ देते हैं। मानव ने सच कर दिखाया कि गांव की धूल से उठकर भी कोई भारत की सफेद जर्सी तक पहुंच सकता है।

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टीना शर्मा ‘माधवी’
फाउंडर

 

 

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टीना शर्मा ‘माधवी’

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